द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
कामो व्रह्मा व्रह्म च व्राह्मणाश्च; त्वत्सम्भूतं स्थास्नु चरिष्णु चेदम् ||
६८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
कामो हि मे सञ्जय़ नित्यमेव; नान्यद्व्रूय़ां तान्प्रति शाम्यतेति |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन सन्ततम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
कामोपचारकुशला भावज्ञाः सर्वकोविदाः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
कामोपभोगेन तु स तस्यां तुष्टिमगादृषिः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
कामोपहतचित्ताङ्गीं भजमानां भजस्व माम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
काम्पिल्ये व्रह्मदत्तस्य अन्तःपुरनिवासिनी |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
काम्यं कर्मफलं लव्ध्वा गुरूणामुपपादय़ेत् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
काम्यं रूपं हि पाञ्चाल्या विधात्रा विहितं स्वय़म् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रिय़म् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
काम्यकं प्राप्य कौन्तेय़ा युधिष्ठिरपुरोगमाः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
काम्यकं वनमुद्दिश्य समुपाय़ान्महीतलम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
काम्यके द्रक्ष्यसे वीरं निवसन्तं युधिष्ठिरम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
काम्यके पाण्डवं द्रष्टुं समाजग्मुर्मनीषिणः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
काम्यके भरतश्रेष्ठा विजह्रुस्ते यथामराः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
काम्यनैमित्तिकाजस्रं यज्ञिय़ाः परमक्रिय़ाः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
काम्यया पृष्टवांस्त्वं मां ततो व्याहृतमुत्तरम् |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
काम्यरूपवती चैषा परिष्वजति भामिनी |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
काम्या शारद्वती चैव ननृतुस्तत्र सङ्घशः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
काम्यां पुष्टिं पृथग्दृष्ट्वा तपोभिस्तप एव च ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवय़ो विदुः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
काम्याष्टम्यां वर्तितव्यं त्रिरात्रं; रसैर्वा गोः शकृता प्रस्नवैर्वा ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
काम्याष्टम्यां वर्तितव्यं दशाहं; रसैर्गवां शकृता प्रस्नवैर्वा ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
काम्याय़ हरिनेत्राय़ स्थाणवे पुरुषाय़ च |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
काम्वोजं निहतं दृष्ट्वा तथालम्वुसमेव च |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
काम्वोजं पश्य दुर्धर्षं काम्वोजास्तरणोचितम् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
काम्वोजः प्राहिणोत्तस्मै परार्ध्यानपि कम्वलान् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
काम्वोजराजः कमलः कम्पनश्च महावलः ||
१९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजराजो वलवांस्ततः पश्चात्सुदक्षिणः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजराजो वलवान्वारय़ामास संय़ुगे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजश्च श्रुताय़ुश्च धनञ्जय़मवारय़न् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजसैन्यं विद्राव्य दुर्जय़ं युधि भारत |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजस्य च दाय़ादे हते राजन्सुदक्षिणे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
काम्वोजा ऋषिका ये च पश्चिमानूपकाश्च ये ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
काम्वोजा और्णिकाः शूद्रास्तथाभीरा नरोत्तम ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
काम्वोजानां महाराज शलभानामिवाय़तिः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजानां सहस्रैस्तु शकानां च विशां पते |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
काम्वोजान्वाटधानांश्च चोलान्पाण्ड्यांश्च सञ्जय़ |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजैः शवलैरश्वैरभ्यवर्तत दुर्जय़ः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजैर्वहुभिः सार्धं यवनैश्च सहस्रशः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
काम्वोजैर्हि समेष्यामि क्रुद्धैराशीविषोपमैः |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
कामय़त्यद्य मां भीरुर्नैषा दूषय़ते कुलम् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
कामय़न्द्वैरथे युद्धमिदं वचनमव्रवीत् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
कामय़ा किमिदं चित्रमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
कामय़ा भगवन्व्रूहि को भवान्द्विजवेषधृक् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०
सूत उवाच
कामय़ा भुजग व्रूहि कोऽसीमां विक्रिय़ां गतः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
कामय़ा व्रूहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
कामय़ा व्रूहि मे तथ्यं सर्वं त्वं प्रय़तात्मवान् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
कामय़ा व्रूहि मे देव कस्त्वं किं च चिकीर्षसि ||
११ ख