chevron_left  तत्रarrow_drop_down
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तत्र भूतं महाकाय़ं चन्द्रार्कसदृशद्युतिम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र भूतान्यनेकानि रक्ष्यन्ते स्म प्रसङ्गतः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र भेरीसहस्राणि शङ्खानामय़ुतानि च |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र भैक्षं समाजह्रुर्व्राह्मीं वृत्तिं समाश्रिताः |
७ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र भोगवती नाम वासुकेस्तीर्थमुत्तमम् |
८१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र भोजकटं नाम चक्रे नगरमुत्तमम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तत्र मर्मसु भीमेन नाराचैस्ताडिता गजाः |
७० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र मल्ला नटा झल्ला ग्रन्थिकाः सौखशाय़िकाः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र मल्ला नटा झल्लाः सूता वैतालिकास्तथा |
५ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र मल्लाः समापेतुर्दिग्भ्यो राजन्सहस्रशः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय २०
भीमसेन उवाच
तत्र मां धर्मराजस्तु कटाक्षेण न्यवारय़त् |
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
तत्र मां प्राहसत्कृष्णः पार्थेन सह सस्वनम् |
३० क
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
तत्र मां यमजौ दूरादालोक्य ललितौ किल |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
तत्र मां वह भद्रं ते द्रोणानीकाय़ मारिष ||
१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
तत्र मातङ्गसङ्काशा लोहिताक्षा विभीषणाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र मासं वसेद्धीरो निय़तो निय़ताशनः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र मासं वसेद्धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र मासं वसेद्वीर कौशिक्यां भरतर्षभ |
१२४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र मासं वसेद्वीर सरस्वत्यां युधिष्ठिर |
३ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र माहिष्मतीवासी भगवान्हव्यवाहनः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र मित्रवलं राजन्मौलेन न विशिष्यते |
८ क
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
तत्र मृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ३
सहदेव उवाच
तत्र मे कौशलं कर्म अववुद्धं विशां पते ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र मे गमनं प्राप्तं रोचते तव माधव |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तत्र मे तद्धनुर्दिव्यं शरश्च निहितः पुरा ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
तत्र मे तात गन्तव्यमह्नाय़ च चिराय़ च ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
युधिष्ठिर उवाच
तत्र मे निश्चिततमं तव कृष्ण गिरा भवेत् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र मे युध्यमानस्य कः सहाय़स्तदाभवत् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र मे रोचते नित्यं पार्थैः सार्धं न विग्रहः |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
तत्र मे रोमहर्षोऽभूदूरुस्तम्भश्च मारिष |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
युधिष्ठिर उवाच
तत्र मे वुद्धिरत्रैव विसर्गे परिमुह्यते |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तत्र मे वुद्धिरुत्पन्ना वाहय़ात्र महारथम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
युधिष्ठिर उवाच
तत्र मे संशय़ो जातः कुतः सञ्ज्ञा मृता इति ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
दुर्योधन उवाच
तत्र मे संशय़ो जातस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
तत्र मे सन्तु गतय़ः सन्तः सत्यं यथाव्रुवम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १०
रुरुरु उवाच
तत्र मे समय़ो घोर आत्मनोरग वै कृतः ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र मेधाविनः केचिदर्थमन्यैः प्रपूरितम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
युधिष्ठिर उवाच
तत्र मेध्येष्वरण्येषु न्यस्तदण्डो जितेन्द्रिय़ः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
तत्र मेऽर्थश्च धर्मश्च भवितेति विचिन्तय़न् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३४
व्रह्मो उवाच
तत्र मोक्ष्यन्ति भुजगा ये भविष्यन्ति धार्मिकाः ||
१३ ग
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र मोदन्ति देवाश्च पितरश्च सवीरुधः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
तत्र यः परमात्मा हि स नित्यं निर्गुणः स्मृतः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
तत्र यत्तौ सुसंरव्धौ दृष्ट्वान्योन्यं व्यवस्थितौ |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
तत्र यत्नमहं कृत्वा गच्छेय़ं नृष्ववाच्यताम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तत्र यत्प्रीतिसंय़ुक्तं काय़े मनसि वा भवेत् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
तत्र यत्प्रीतिसंय़ुक्तं काय़े मनसि वा भवेत् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
तत्र यत्प्रीतिसंय़ुक्तं किञ्चिदात्मनि लक्षय़ेत् |
२० क