chevron_left  कारणाभ्यामथैताभ्यामुत्थानमफलंarrow_drop_down
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
कारणाभ्यामथैताभ्यामुत्थानमफलं भवेत् |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
कारणे सम्भजन्तीह कृतार्थाः सन्त्यजन्ति च ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
कारणैर्धर्ममन्विच्छन्न लोकानाप्नुते शुभान् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
कारण्डवैः प्लवैर्हंसैर्वकैर्मद्गुभिरेव च |
५० ख
आदि पर्व
अध्याय २०८
वैशम्पाय़न उवाच
कारन्धमं प्रसन्नं च हय़मेधफलं च यत् |
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ४६
दुर्योधन उवाच
कारस्करा लोहजङ्घा युधिष्ठिरनिवेशने ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
कारस्करान्महिषकान्कलिङ्गान्कीकटाटवीन् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
कारावरो निषाद्यां तु चर्मकारात्प्रजाय़ते |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
कारीषिरथ संश्रुत्यः परपौरवतन्तवः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
पुत्र उवाच
कारुण्यमेवात्र पश्य भूत्वेह जडमूकवत् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
कारुण्यात्साधुभावाच्च देवी राजन्न चक्षमे ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
कारुण्यात्सौहृदाच्चैव वारय़े त्वां महावल |
८० क
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
कारुण्यादभिसन्तप्तः पर्यशोचत तां द्विजः ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिश्च वीर्यवान् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिस्तथैव च |
५९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
कारूषा मत्स्यशेषाश्च केकय़ाः काशिकोसलाः |
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
कार्तवीर्यवधो यत्र हैहय़ानां च वर्ण्यते |
११७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कार्तवीर्यश्च रामेण भार्गवेण हतो यथा ||
५२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
कार्तवीर्यसमं वीर्ये कर्णं राज्ञोऽगमन्मनः |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
कार्तवीर्यसमः कुन्ति शिवितुल्यपराक्रमः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
कार्तवीर्यसमो वीर्ये वृहस्पतिसमो मतौ ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
कार्तवीर्यसमौ युद्धे तथा दाशरथेः समौ |
२० क
सभा पर्व
अध्याय १४
कृष्ण उवाच
कार्तवीर्यस्तपोय़ोगाद्वलात्तु भरतो विभुः |
११ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
राम उवाच
कार्तवीर्यस्य दाय़ादैर्वने मृग इवेषुभिः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
कार्तवीर्यस्य पुत्रास्तु जमदग्निं युधिष्ठिर |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
व्राह्मण उवाच
कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भामिनि ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
कार्तवीर्यानिरुद्धाभ्यां नहुषेण यय़ातिना |
६६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
व्राह्मण उवाच
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा वाहुसहस्रवान् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
कार्तवीर्यो हतो येन चक्रवर्ती महामृधे ||
१३७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
कार्त्तिकं तु नरो मासं यः कुर्यादेकभोजनम् |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
कार्त्तिकस्य तु मासस्य प्रवृत्तं प्रथमेऽहनि |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
कार्त्तिकीं वा वसेदेकां पुष्करे सममेव तत् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
कार्त्तिकेय़ इवाजेय़ः शरस्तम्वात्सुतोऽभवत् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
कार्त्तिकेय़श्च भगवांस्त्रिसन्ध्यं किल भारत |
११७ क
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
कार्त्तिकेय़स्य दय़ितं रोहीतकमुपाद्रवत् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
कार्त्तिकेय़ानुय़ाय़िन्यो नानारूपाः सहस्रशः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
कार्त्तिकेय़ाय़ सम्प्रादाद्विधाता लोकविश्रुतौ ||
३८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
कार्त्तिकेय़ेन विध्वस्तामासुरीं पृतनामिव ||
३० ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
कार्त्तिकेय़ो यथा नित्यं देवानामभवत्पुरा |
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
कार्त्तिक्यां कारय़ित्वेष्टिं व्राह्मणैर्वेदपारगैः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
कार्त्तिक्यां तु विशेषेण योऽभिगच्छेत पुष्करम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
कार्त्तिक्यामद्य भोक्तारः सहस्रं मे द्विजोत्तमाः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
कार्त्स्न्येन तारकवधं परं कौतूहलं हि मे ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
कार्त्स्न्येन भरतश्रेष्ठ किमन्यदिह वर्तताम् ||
१४१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
कार्त्स्न्येनैतत्समाचक्ष्व भगवन्कुशलो ह्यसि ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
गौतम्यु उवाच
कार्थप्राप्तिर्गृह्य शत्रुं निहत्य; का वा शान्तिः प्राप्य शत्रुं नमुक्त्वा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कार्पण्यं दर्पमानौ च भय़मुद्वेग एव च |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
अर्जुन उवाच
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः; पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
कार्पण्यादेव सहितास्तत्र राज्ञो; नाशक्नुवन्प्रतिवक्तुं सभाय़ाम् |
३४ क