शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकं चास्य चिच्छेद क्षुराभ्यां ध्वजमेव च ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकं तस्य चिच्छेद फल्गुनः परवीरहा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकं भीमसेनस्य द्विधा चिच्छेद भारत ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकं भ्रामय़ामास हेमपृष्ठं दुरासदम् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकप्रवरं चास्य प्रचिच्छेद शितैः शरैः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकाकर्षविक्षिप्तं नाराचवहुविद्युतम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकाण्याददुस्तूर्णमर्जुनार्थे परन्तपाः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकेणोपपन्नेन विमलादित्यवर्चसा |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
कार्मुकैर्विशिखैः प्रासैः खड्गैः परशुपट्टिशैः ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
कार्मुकोर्मिणमक्षय़्यमद्वीपं समरेऽप्लवम् |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कार्य इत्याहुराचार्या विषमे जीवितार्थिना ||
४४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कार्य इत्येव तत्त्वज्ञाः प्राहुर्नित्यं युधिष्ठिर ||
१९८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
विराट उवाच
कार्यं कुरुत तैः सर्वे यथाकामं यथासुखम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
युधिष्ठिर उवाच
कार्यं कुर्यान्न वा कुर्यात्संवार्यो वा भवेन्न वा |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
कार्यं च प्रतिपेदे तन्मनसा सुमहातपाः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
इन्द्राण्यु उवाच
कार्यं च हृदि मे यत्तद्देवराजावधारय़ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
भीष्म उवाच
कार्यं चातिथ्यमस्माभिर्वय़ं सर्वे कुटुम्विनः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
कार्यं पात्रगतं नित्यमन्नं हि परमा गतिः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
कार्यं भवेत्तत्सुहृद्भिर्निय़ुज्य; धर्मं पुरस्कृत्य सुदीर्घकालम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
कार्यं मे काङ्क्षितं किञ्चिद्धृदि सम्परिवर्तते |
४२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
कार्यं यत्नेन शत्रूणां स्वराष्ट्रं रक्षता स्वय़म् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२७
सोमक उवाच
कार्यं वा यदि वाकार्यं येन पुत्रशतं भवेत् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
कार्यं संरक्ष्यते चैष कुरुसेनामहारथैः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
कार्यं सततमिच्छद्भिः श्रेय़ः सर्वात्मना गृहे ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
कार्यं हि सुमहत्पार्थो गाण्डीवेन करिष्यति |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
कार्यः श्रेय़ोर्थिना तौ हि श्रेय़ोघातार्थमुद्यतौ ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
कार्यकारणसंश्लिष्टं स्वजनं नाम विभ्रति ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
कार्यकारणसंय़ोगे स हेतुरुपपादितः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
सर्प उवाच
कार्यकारणसन्देहो भवत्यन्योन्यचोदनात् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
कार्यकालं च मन्येऽहं विधिदृष्टस्य कर्मणः |
१८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
व्रह्मदत्त उवाच
कार्यते चैव कालेन तन्निमित्तं हि जीवति ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
कार्यते यच्च क्रिय़ते सच्चासच्च कृतं ततः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
कार्यमित्येव मन्वाना धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
कार्यमित्येव मन्वाना धार्मिकाः पुण्यकर्मिणः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
कार्यमित्येव यत्कर्म निय़तं क्रिय़तेऽर्जुन |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
राम उवाच
कार्यमेतन्महद्व्रह्मन्काशिकन्यामनोगतम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
कार्यवन्तो गृहानेत्य शत्रुतो नार्हणां वय़म् |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
कार्यविघ्नमनुस्मृत्य पूर्ववैरं च भारत ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
कार्यव्यासक्तमनसः सङ्कल्पो जाग्रतो ह्यपि |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
कार्यसंसाधनार्थाय़ स्वस्ति तेऽस्तु भुजङ्गम ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
कार्यस्तत्र न शोको वै भुङ्क्ष्व भोगान्यजस्व च ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत्ते वक्ष्यामि पृच्छतः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
कार्या चापचितिस्तेषां सर्वस्वेनापि या भवेत् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
कार्या यात्रा यथाकालं यथाधर्मं यथाविधि ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
कार्या रुधिरमांसाढ्या वलय़ो यक्षरक्षसाम् |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
कार्याकार्यं च नः सर्वं शंस वै त्वं प्रजापते ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
कार्याकार्यमजानन्वै प्रतिज्ञां कृतवान्रणे ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
कार्याकार्ये पूजय़ित्वा प्रसाद्य; यः सम्पृच्छेन्न स मुह्येत्कदाचित् ||
२१ ख