chevron_left  कालचारित्रतत्त्वज्ञःarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
कालचारित्रतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः |
१०५ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
मेनको उवाच
कालजिह्वं सुरश्रेष्ठ कथमस्मद्विधा स्पृशेत् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
कालज्ञं च नय़ज्ञं च कः प्रिय़ं न करिष्यति ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
भीष्म उवाच
कालज्ञः समय़ज्ञश्च सदा वश्यश्च नोद्रुमः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
कालज्ञानं विप्र गवान्तरं हि; दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
कालज्ञानगतिश्चैव ज्योतिषां च व्यतिक्रमः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
कालदण्डं यमो राजा शिविकां च धनेश्वरः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
युधिष्ठिर उवाच
कालदण्डविनिष्पिष्टस्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
कालधर्मपरीतात्मा निधनं समुपागतः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
कालनेमिनिहा वीरः शूरः शौरिर्जनेश्वरः |
८२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कालपक्वमिदं मन्ये सर्वक्षत्रं जनार्दन |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
वासुदेव उवाच
कालपक्वमिदं सर्वं दुर्योधनवशानुगम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २
व्यास उवाच
कालपर्याय़माज्ञाय़ मा स्म शोके मनः कृथाः ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
कालपाशग्रहां घोरां नदीं वैतरणीमिव ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
कालप्रभवसंस्थासु सज्जन्ते च त्रय़स्तदा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
कालप्राप्तमहं मन्ये मा त्वं दुर्योधनातिगाः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
कालप्राप्तमिदं मन्ये मा त्वं दुर्योधनातिगाः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
कालप्राप्तमुपादद्यान्नार्थं राजा प्रसूचय़ेत् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
कालप्राप्तमुपासीत सस्यानामिव कर्षकः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
कालप्रय़त्नोत्तमशिल्पिय़त्नैः; कृतं सुरूपं वितमस्कमुच्चैः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
कालमिच्छाम्यहं लव्धुं किञ्चित्त्वत्तः सुरेश्वर |
४ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कालमूलमिदं सर्वं जगद्वीजं धनञ्जय़ |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
कालमूलमिदं सर्वं भावाभावौ सुखासुखे ||
१८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
युधिष्ठिर उवाच
कालमृत्युय़मानां च व्राह्मणस्य च सत्तम |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
कालरात्रिनिभा ह्यासीद्घोररूपा भय़ावहा ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
कालरात्रिमिवात्युग्रां नरनागाश्वभोजनाम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
कालवद्विचरिष्यामि द्रौणेरस्त्रं विशातय़न् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
कालवन्न्यवधीद्द्रोणो युवेव स्थविरो वली ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
कालवर्षाश्च पर्जन्याः सस्यानि रसवन्ति च |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि फलवन्ति च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
कालवर्षी च पर्जन्यो धर्मचारी च पार्थिवः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च |
८८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
कालशाकं च लौहं चाप्यानन्त्यं छाग उच्यते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
कालशाकं तु विप्रेभ्यो दत्त्वा मर्त्यः समूलकम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२९
श्रीभगवानु उवाच
कालश्चास्य मय़ा कृत इति ||
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
कालसङ्ख्यानसङ्ख्यातं सृष्टिस्थितिपराय़णम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
कालसञ्चोदितः कालः कालपर्याय़निश्चितः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
कालसञ्चोदितः क्षेत्री विशीर्णाद्वा गृहाद्गृहम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
वृत्र उवाच
कालसञ्चोदिता जीवा मज्जन्ति नरकेऽवशाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
कालसैन्यावगाढस्य सर्वं न प्रतिभाति मे ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २७९
मार्कण्डेय़ उवाच
कालस्तपस्यतां कश्चिदतिचक्राम भारत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
कालस्तु वलवान्प्राप्तस्तेन तिष्ठसि वासव ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
श्रीरु उवाच
कालस्तु शक्र पर्याय़ान्मैनं शक्रावमन्यथाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
कालस्ते विक्रमस्याद्य जहि शत्रून्पुरन्दर ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
कालस्ते स्वर्गमारोढुं कालोऽहं त्वामुपागतः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
कालस्त्वय़ं मृत्युमय़ोऽतिदारुणो; दुर्योधनो युद्धमुपागमद्यत् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
कालस्य च यथा वृत्तं तत्ते सुविदितं प्रभो ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
कालस्य च हि मृत्योश्च जङ्गमस्थावरस्य च |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
कालस्य नातिमहतः पुनः शक्रेण पातितः ||
३ ख