सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
कालस्य नय़ने युक्ता यमस्य पुरुषाश्च ये |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
कालस्य नय़ने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कालस्य नय़ने युक्ताः सोमपत्न्यः शुभव्रताः |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
कालस्य परमा योनिः कालश्चाय़ं सनातनः ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
मातलिरु उवाच
कालस्य परिणामेन ततस्त्वमिह भारत |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
कालस्य मृत्योश्च तथा यद्वृत्तं तन्निवोध मे |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
कालस्य वलमेतावद्विपरीतार्थदर्शनम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
कालहीनं तु यद्दानं तं भागं रक्षसां विदुः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
कालाकाङ्क्षी चरन्नेवं व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान्निरपाय़ इवात्मवान् ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
कालाकाङ्क्षी यामय़ेच्च यथा विस्रम्भमाप्नुय़ुः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
कालाकालौ सम्प्रधार्य वलावलमथात्मनः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
कालाख्यः पुरुषाख्यश्च व्रह्माख्यश्च त्वमेव हि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
कालागरुप्रभृतिभिर्गन्धैश्चोच्चावचैस्तथा ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
कालागुरुविमिश्रेण तथा तुङ्गरसेन च ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे ||
९२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
कालाग्निमिव दुर्धर्षं समवेष्टत नित्यशः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कालातिक्रमणाद्ध्येते भक्तवेतनय़ोर्भृताः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कालातीतमपार्थं हि न प्रशंसन्ति पण्डिताः ||
५८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
कालात्पश्यति भूतानां सदैव प्रभवाप्ययौ ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
कालात्स भगवान्विष्णुर्यस्य सर्वमिदं जगत् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
कालानलविषा घोरा हुताः शतसहस्रशः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
कालानलसमप्रख्यो द्विषतामन्तको युधि |
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
कालान्तकवपुः क्रूरः सूतपुत्रश्चचार ह ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कालाम्ररसपीतास्ते नित्यं संस्थितय़ौवनाः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कालाम्रश्च महाराज नित्यपुष्पफलः शुभः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
कालाल्लाभो यस्तु सद्यो भवेत; हते श्रेय़ः कुत्सिते त्वीदृशे स्यात् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
वैशम्पाय़न उवाच
कालावस्था तदा ह्यन्या वर्तते सा न साम्प्रतम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
कालाय़ाः प्रथिताः पुत्राः कालकल्पाः प्रहारिणः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
कालिकाश्रममासाद्य विपाशाय़ां कृतोदकः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
कालिकासङ्गमे स्नात्वा कौशिक्यारुणय़ोर्यतः |
१३५ क
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
कालिन्दी विदिशा वेण्णा नर्मदा वेगवाहिनी ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
कालिय़ो मणिनागश्च नागश्चापूरणस्तथा |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
काली स्त्री पाण्डुरैर्दन्तैः प्रविश्य हसती निशि |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कालीं रक्तास्यनय़नां रक्तमाल्यानुलेपनाम् |
६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
कालीय़ो नहुषश्चैव कम्वलाश्वतरावुभौ ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
काले कालेऽस्य सम्प्राप्ते नैव विद्येत भोजनम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
काले गावः प्रसूय़न्ते नार्यश्च भरतर्षभ |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
काले च पुष्पैर्वलय़ः क्रिय़न्ते; तस्मिन्गृहे नित्यमुपैमि वासम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
काले चतुर्थे भुञ्जानो व्रह्मचारी व्रती भवेत् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
काले दाता च भोक्ता च शुद्धाचारस्तथैव च ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
काले धुरि निय़ुक्तानां वहतां भार आहिते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
काले परिणते कालः कालय़िष्यति मामिव ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
काले परिमिताहारो व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
काले पात्रे च हृष्टात्मा राजन्विगतमत्सरः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
व्यास उवाच
काले प्राप्ते चरन्भैक्षं कल्पते व्रह्मभूय़से ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
द्रौपद्यु उवाच
काले प्राप्ते द्वय़ं ह्येतद्यो वेद स महीपतिः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
काले प्रय़ोजय़ेद्राजा तस्मिंस्तस्मिंस्तदा तदा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधय़ो न च ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः |
६६ क