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वन पर्व
अध्याय ७३
केशिन्यु उवाच
तं तु दृष्ट्वा यथासङ्गमुत्सर्पति यथासुखम् |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
तं तु दृष्ट्वा हतं शूरमश्वत्थामा महारथः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
तं तु द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणिश्च सवृहद्वलः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
तं तु धौम्यादय़ो विप्राः परिवार्योपतस्थिरे |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ४०
सूत उवाच
तं तु नादं ततः श्रुत्वा मन्त्रिणस्ते प्रदुद्रुवुः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तं तु नादं ततः श्रुत्वा सुप्तो वानरपुङ्गवः |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तं तु नानाप्रहरणैर्नानाय़ुद्धविशेषणैः |
५७ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तं तु पश्यन्महावाहुर्जानन्कालस्य पर्ययम् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
तं तु प्रत्युदिय़ाच्छीघ्रं क्षेमधूर्तिर्महाय़शाः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
तं तु प्रस्थितमाज्ञाय़ कर्णदुःशासनादय़ः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
तं तु भीमो मुहूर्तेन व्यश्वसूतरथध्वजम् |
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
तं तु भीमोऽभ्ययात्तूर्णं वार्यमाणः सुतैस्तव ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
तं तु यज्ञं तथारूपं गच्छन्तमुपलभ्य सः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
तं तु यज्ञं महावाहुरा समाप्तेर्जनार्दनः |
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तं तु यान्तं महावेगैरश्वैः कपिवरध्वजम् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
तं तु राजन्विभुः शौरी राजानं वलिनां वरम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
तं तु राजा प्रतोदेन चोदय़ामास भारत ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तं तु राजा यथाशास्त्रमन्वशाद्धार्मिकस्तदा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
तं तु राजा वलिर्नाम सर्वधर्मविशारदः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तं तु लोके वरः पुंसां किरीटी हेमवर्मभृत् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
तं तु वज्रहतं दृष्ट्वा शय़ानमचलोपमम् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
तं तु शङ्खस्वनं श्रुत्वा संशप्तकवरूथिनी |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
तं तु शव्दं महच्छ्रुत्वा कृतवर्मा महारथः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तं तु शव्दमभिश्रुत्य भीमसेनो महावलः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
तं तु शुश्राव धर्मिष्ठं मुद्गलं संशितव्रतम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तं तु शोकेन सन्तप्तं स्वप्ने कपिवरध्वजम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
मतङ्ग उवाच
तं तु शोचामि यो लव्ध्वा व्राह्मण्यं न वुभूषते ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तं तु श्रुत्वा महानादं प्रहृष्टानां महात्मनाम् |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
तं तु संमन्त्र्य युष्माभिर्वक्तुमिच्छामि शङ्करे ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तं तु सम्प्रेक्ष्य ते पुत्राः सैनिकाश्च विशां पते |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तं तु सम्प्रेक्ष्य पुत्रस्ते दुर्मुखः शत्रुकर्शनः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
तं तु सम्प्रेक्ष्य सङ्क्रुद्धं सात्यकिः प्रत्यविध्यत |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
तं तु साय़कमप्राप्तमाचार्यस्य रथं प्रति |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
भीष्म उवाच
तं तु हत्वा नरवरं हेहय़ास्ते महारथाः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
तं तु हत्वा महावाहुः सहदेवो व्यरोचत |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तं तु हित्वा हतं वीरं सारथिः शत्रुकर्शनम् |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तं तूर्णमभिधावन्तं पाञ्चाला जितकाशिनः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तं तूर्णमिव वीभत्सुः सर्वशस्त्रभृतां वरः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तं ते दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवाः |
४० क
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
तं ते प्रवरय़ामासुर्निरासुश्च परावसुम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
तं तेजसा प्रज्वलितं प्रतपन्तं दिशो दश ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तं तेऽभिषिषिचुर्वाणैर्मेघा गिरिमिवाम्वुभिः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
तं तोषय़ महावाहो तपसा वरदं हरम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
तं तोषय़ित्वा तपसा पुत्रं लप्स्ये महावलम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
तं त्वं क्रुद्धः प्रत्यषेधीः पुरस्ता; च्छर्यातिय़ज्ञं स्मर तं महेन्द्र ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
तं त्वं प्रहरतां श्रेष्ठ नडं नाग इवोद्धर ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
तं त्वं प्रार्थय़से मन्द वालश्चन्द्रमसं यथा ||
३७ ख