सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्न लोभान्मोहाद्वा विश्रम्भात्प्रणय़ेन वा |
८२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
कच्चिन्न वाचा वृजिनं कदा चि; दकार्षं ते मनसोऽभिषङ्गात् ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कच्चिन्न वाचा वृजिनं हि किं चि; दुच्चारितं मे मनसोऽभिषङ्गात् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्न वामो मम मूर्ध्नि पादः; कृष्णाभिमर्शेन कृतोऽद्य पुत्र ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चिन्न वारितौ क्षुद्रै रक्षिभिर्नोपलक्षितौ |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
कच्चिन्न वालो युष्माभिः परानीकं प्रवेशितः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्न विकृतो वालो द्रोणकर्णकृपादिभिः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन; वैश्येन वा करदेनोपपन्ना |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद्गुह्यं न भाषसे ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
देवा ऊचुः
कच्चिन्न सङ्क्षय़ः प्राप्तो लोकानाममरेश्वर ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ताः परोक्षास्ते विशङ्किताः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
कच्चिन्न सागरं तीर्त्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः |
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
कच्चिन्न हेतोरिव वर्त्मभूत; उपेक्षते तेषु स न्यूनवृत्तिम् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्नगरगुप्त्यर्थं ग्रामा नगरवत्कृताः |
७१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्नन्दसि दृष्ट्वैतान्कच्चित्ते निर्मलं मनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्नापानुदद्द्रोणादिषुभिर्वो धनञ्जय़ः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्नाय़ं वचनात्सौवलस्य; समाह्वाता देवनाय़ोपय़ाति |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित्काले विवुध्यसे |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
कच्चिन्नेदं श्रुतं पार्थ मर्त्येनान्येन केनचित् ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
कच्चिन्नैकः परित्यक्तः पाण्डवैर्निहतो रणे |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्नैको वहूनर्थान्सर्वशः साम्पराय़िकान् |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्वेजितप्रजाः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
कच्चिन्नोभय़विभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति |
३८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्मनस्ते प्रीणाति वनवासे नराधिप ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्मन्त्रय़से नैकः कच्चिन्न वहुभिः सह |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
कच्चिन्मानं तात लभन्त एते; धनुर्भृतः कच्चिदेतेऽप्यरोगाः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्मुखं न गोविन्द तेनाजौ विकृतं कृतम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमाः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१११
वेश्यो उवाच
कच्चिन्मुने कुशलं तापसानां; कच्चिच्च वो मूलफलं प्रभूतम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिन्मूलं दृढं कृत्वा यात्रां यासि विशां पते |
५२ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परन्तप |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
कच्चिल्लोकत्रय़स्यास्य स्वस्ति लोकपराय़ण ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिल्लोकेषु कुशलं कच्चिद्धर्मः स्वनुष्ठितः |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
कच्छपश्चापकुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
कच्छपीं सुखशव्दां तां गृह्य वीणां मनोरमाम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
कच्छपो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यकः |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
कच्छा गोपालकच्छाश्च लाङ्गलाः परवल्लकाः |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
यय़ातिरु उवाच
कञ्चित्कालं चरेय़ं वै विषय़ान्वय़सा तव ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
कञ्चित्कालं तु तं वह्निं स एव शमय़िष्यति |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
कञ्चित्कालं मनुष्येन्द्र सूतानामनुगा वय़म् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
कञ्चित्कालं मृष्यतां वै ततोऽसि भविता द्विजः |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
कञ्चित्कालं विहृत्यैवमनुभूय़ परां मुदम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
कञ्चित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
कञ्चित्कालमिमं देवा मर्षय़ध्वमतन्द्रिताः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
कञ्चित्कालमिय़ं स्थित्वा त्वय़ि वासव चञ्चला |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
व्राह्मण उवाच
कञ्चिदर्थमनर्थज्ञः प्रष्टुकामो भुजङ्गम ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
कञ्चिदर्थमभिप्रेत्य सा सङ्ख्येत्युपधार्यताम् ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
कञ्चिन्नासादय़ामास कालेन महता अपि ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
कञ्चुकोष्णीषिणस्तत्र वेत्रझर्झरपाणय़ः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
कटाक्षहावमाधुर्यैश्चेतोवुद्धिमनोहराः ||
३२ ख