भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
शिरोऽभूद्द्रुपदो राजा महत्या सेनय़ा वृतः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
भीष्म उवाच
शिलवृत्तिः कथान्ते तु सिद्धमामन्त्र्य यत्नतः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
भीष्म उवाच
शिलवृत्तिस्तु सिद्धस्य वाक्यैः सम्वोधितस्तदा |
१०२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
भीष्म उवाच
शिलवृत्तेर्गृहं प्राप्तः स तेन विधिनार्चितः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
शिलानामिव शैलेषु पतन्तीनामभूत्तदा ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
शिलानामिव शैलेषु पतितानामभूत्स्वनः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
शिलाभिर्विविधाभिश्च कार्मुकैश्च महास्वनैः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
शिलावर्षेण महता छादय़ामास केशवम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
शिलावर्षेण सहसा महता मां समावृणोत् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
शिलाशितेन च विभो क्षुरप्रेण महाय़शाः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शिलाशितेन भल्लेन धनुश्चिच्छेद संय़ुगे |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
शिलाहतानां च महारथानां; महान्निनादः पततां वभूव ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
शिलीमुखाः पार्थधनुःप्रमुक्ता; रथान्ध्वजाग्राणि धनूंषि वाहून् |
११२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
शिलीमुखेन चाप्येनं भ्रुवोर्मध्ये समार्दय़त् ||
५९ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
शिलीमुखैः शिखण्डी च द्रोणपुत्रं समार्दय़न् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
शिलीमुखैर्महाराज मा गास्तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
८९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
शिलीशलकरो मूकः सुकुमारः प्रवेपनः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय़ शेषान्नकृतभोजनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
व्यास उवाच
शिलोञ्छवृत्तिमुत्सृज्य शममातिष्ठदुत्तमम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा मुद्गलः संशितव्रतः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
भीष्म उवाच
शिलोञ्छवृत्तेः संवादं सिद्धस्य च युधिष्ठिर ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
शिल्पप्रतिकरानेव शिल्पिनः प्रति कारय़ेत् ||
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
शिल्पिनो वणिजो वैश्याः सर्वकर्मोपजीविनः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
शिल्पिभिः सुकृतं ह्याप्तैर्विनीतैर्वेश्मकर्मणि |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
शिलय़ा नगरं वा तन्मर्दितव्यं मय़ा यदि |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
शिवं च रमणीय़ं च सर्वर्तु सुमहाधनम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
शिवं ध्याय़स्व मेऽत्रस्थः सुकृतं स्मर्यते यदि ||
१६६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
शिवं नाभ्यां वलादिन्द्रं वाय़्वग्नी प्राणतोऽसृजत् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५२
कुरुरु उवाच
शिवं महत्पुण्यमिदं दिवौकसां; सुसंमतं स्वर्गगुणैः समन्वितम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
शिवं व्रह्मसरो यत्र सेवितं त्रिदशर्षिभिः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
शिवं सदैवेह सुरेन्द्र तुभ्यं; ध्याय़ामि पूजां च सदा प्रय़ुञ्जे |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
शिवः पन्थाः सुनीतोऽत्र मय़ा पूर्वतरं वृतः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
शिवदत्तवराञ्जघ्नुरसुरेन्द्रान्सुरा भृशम् ||
५५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
शिवमाशास्स्व मे मातर्युध्यमानस्य शत्रुभिः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
शिवमिच्छन्मनुष्याणां तस्मादेश शिवः स्मृतः ||
९० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
शिवमिच्छन्मनुष्याणां तस्मादेष शिवः स्मृतः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
शिवमित्येव यं प्राहुरीशं रुद्रं पिनाकिनम् |
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
शिवमेभिः स्तुवन्देवं नामभिः पुष्टिवर्धनैः |
१५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
शिवश्चानुववौ वाय़ुः प्रशान्तमभवद्रजः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
द्रोण उवाच
शिवस्त्राता भवास्माकं मास्मानद्य विनाशय़ ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
शिवा चाशिवसङ्काशा तस्य वक्त्रात्सुदारुणा |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
शिवा नक्षत्रसम्पन्ना सा व्यतीय़ाय़ भारत ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
शिवा नक्षत्रसम्पन्ना सा व्यतीय़ाय़ शर्वरी ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
शिवा भार्या त्वङ्गिरसः शीलरूपगुणान्विता |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
शिवा सौम्या च या तस्य धर्मस्त्वापोऽथ चन्द्रमाः ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
शिवानामशिवा घोराः शृण्वन्ति विविधा गिरः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
युधिष्ठिर उवाच
शिवान्सुखान्महोदर्कानहिंस्राँल्लोकसंमतान् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
शिवाभिरशिवाभिश्च रुवद्भिर्भैरवं रवम् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
शिवाश्च भय़वेदिन्यो नेदुर्दीप्तस्वरा भृशम् ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
शिवाश्च विनदन्त्येता दीप्ताय़ां दिशि दारुणाः |
६ क