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शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव; त्रिंशत्तु काष्ठा गणय़ेत्कलां ताम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
काष्ठां चासाद्य धानिष्ठां हिममुत्सृजते पुनः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
काष्ठातीत इवादित्यः प्रतपन्युगसङ्क्षय़े |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
काष्ठानि चाभिहार्याणि तथा कूपांश्च खानय़ेत् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
काष्ठानीमानि सन्तीह जहि सन्तापमात्मनः ||
७७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
मन उवाच
काष्ठानीवार्द्रशुष्काणि यतमानैरपीन्द्रिय़ैः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां नराधिप ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
काष्ठे समुद्गे प्रक्षिप्य गङ्गाय़ां समवासृजन् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
काष्ठैरार्द्रैर्यथा वह्निरुपस्तीर्णो न दीप्यते |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
कासि कस्य कुतो वेति त्वय़ाहमभिचोदिता |
९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
कासि कस्य कुतो वेति वचने किं प्रय़ोजनम् ||
१२७ ग
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगय़से वने |
११३ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
कासि कस्यासि किं चेह कुरुषे त्वं शुभानने ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
कासि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
कासि कस्यासि सुश्रोणि किमर्थं चागता वनम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
गाव ऊचुः
कासि देवि कुतो वा त्वं रूपेणाप्रतिमा भुवि |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
काय़ं चामेध्यसङ्घातं विनाशं कर्मसंहितम् ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
काय़मभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्रः परिचिन्तय़ेत् ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
काय़व्या दरदा दार्वाः शूरा वैय़मकास्तथा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
काय़शोधनमासाद्य तीर्थं भरतसत्तम |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
काय़स्य महतो भेदे लाघवे दूरपातने |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
काय़ाच्छिरः सर्पविषाग्निकल्पैः; शरोत्तमैरुन्मथितास्मि राम ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
काय़े प्रवेशय़ामास पशोरिव पिनाकधृक् ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
काय़े मत्स्या इमौ राजन्सम्भूतौ मानुषाविति ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
काय़े विषक्तास्तु तदा वाय़ुनाभिसमीरिताः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३
भीष्म उवाच
काय़ेन त्रिविधं कर्म वाचा चापि चतुर्विधम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
काय़ेन मनसा वुद्ध्या केवलैरिन्द्रिय़ैरपि |
११ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
काय़ेभ्यः प्रच्युता धारा राक्षसानां समन्ततः ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
राम उवाच
काय़ेषु विदितं तुभ्यं पुरा क्षत्रिय़सङ्गरे ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
किं कत्थितेन वहुधा युध्यस्व त्वं वृकोदर |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
दुर्योधन उवाच
किं कत्थितेन वहुधा युध्यस्वाद्य मय़ा सह |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
किं करवाणीति ||
२८ 6
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
किं करवाणीति ||
१०७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
किं करिष्यथ शोचित्वा मृतं किमनुशोचथ |
४० क
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
किं करोमि क्व गच्छामि कथं कार्यं भवेन्मम ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
किं करोमीति चोवाच कालसूर्य इवोदितः |
४४ ख
वन पर्व
अध्याय २१७
मार्कण्डेय़ उवाच
किं करोमीति ताः स्कन्दं सम्प्राप्ताः समभाषत ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
वैशम्पाय़न उवाच
किं करोम्यवशो राज्ञि व्रूहि कर्ता तदस्मि ते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३
युधिष्ठिर उवाच
किं कर्तव्यं मनुष्येण लोकय़ात्राहितार्थिना |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
किं कर्म किमकर्मेति कवय़ोऽप्यत्र मोहिताः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ११
युधिष्ठिर उवाच
किं कर्म तेनाचरितं तपो वा निय़तव्रतम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
जनक उवाच
किं कर्म दूषय़त्येनमथ जातिर्महामुने |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
युधिष्ठिर उवाच
किं कर्म पुरुषः कृत्वा शुभं पुरुषसत्तम |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८४
भरद्वाज उवाच
किं कस्य धर्मचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ८५
अष्टक उवाच
किं कारणं कार्तय़ुगप्रधान; हित्वा तत्त्वं वसुधामन्वपद्यः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३६
शौनक उवाच
किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत्प्रथितं भुवि |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २३
सूत उवाच
किं कारणं मय़ा मातः कर्तव्यं सर्पभाषितम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
किं कार्यं भवतः कार्यमस्माभिर्यौवनेन च ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
किं कार्यं वः करोम्यद्य युष्मत्प्रीतिविवर्धनम् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
शुक उवाच
किं कार्यं व्राह्मणेनेह मोक्षार्थश्च किमात्मकः |
१३ क