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शान्ति पर्व
अध्याय १०९
युधिष्ठिर उवाच
किं कार्यं सर्वधर्माणां गरीय़ो भवतो मतम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
किं कार्यं स्वागतं तेऽस्तु राज्ञा पृष्टश्च भारत |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
किं कार्यमवशिष्टं वो हतस्त्वाष्ट्रो महासुरः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
किं कार्यमिति ते राजन्विचिन्त्य भय़मोहिताः |
५२ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
किं कुर्मः पुरुषव्याघ्र व्रवीहि पुरुषर्षभ |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये; तस्मात्सन्तापं वर्जय़ाम्यप्रमत्तः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
किं कुर्वन्कर्म नृपतिरुभौ लोकौ समश्नुते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
युधिष्ठिर उवाच
किं कुर्वन्निर्भय़ो लोके सिद्धश्चरति भारत ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
युधिष्ठिर उवाच
किं कुर्वन्सुखमाप्नोति किं कुर्वन्दुःखमाप्नुते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
किं कुर्वाणं न मां जह्याज्ज्वलिता श्रीः प्रतापिनी ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
किं कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नुः पाण्डवसृञ्जय़ाः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
किं कुर्वाणो मय़ा सङ्ख्ये हतो भूरिश्रवा इति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १०१
जनमेजय़ उवाच
किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेय़िवान् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
किं कृतं ते नरश्रेष्ठ निघ्नतो मामनागसम् |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
किं कृतं सलिले शर्व चिरकालं स्थितेन ते |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
युधिष्ठिर उवाच
किं कृतं सुकृतं कर्म तात जाजलिना पुरा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
किं कृतं सूत कर्णेन वदता परुषं वचः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
किं कृत्वा चैव मुच्येत तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
किं कृत्वा धारय़ेय़ं वै प्राणानित्यभ्यचिन्तय़त् ||
२९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
किं कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुय़ोधनः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १०
इन्द्र उवाच
किं कृपाय़ितमस्त्यत्र पुत्र एकोऽत्र पीड्यते ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
किं क्षत्रिय़ाणां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
कर्ण उवाच
किं क्षेपैर्दुर्वलाश्वासैः शरैः कथय़ भारत |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
युधिष्ठिर उवाच
किं च कुर्वन्नरो लोके प्राप्नोति परमां गतिम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
किं च कृत्वा परं स्वर्गं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
युधिष्ठिर उवाच
किं च तत्क्षरमित्युक्तं यस्मादावर्तते पुनः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
किं च तत्र मय़ा कार्यं कथय़ध्वं यथातथम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय २२४
जरितो उवाच
किं च ते मध्यमे कार्यं किं कनिष्ठे तपस्विनि ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
किं च तेन कृतं तत्र वसता व्रह्मवित्तम |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
किं च तेन मय़ोक्तेन यान्यभाषन्त कौरवाः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
किं च नः पाण्डवैः कार्यं हीनार्थवलपौरुषैः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
किं च पात्रमपात्रं वा तन्मे व्रूहि पितामह ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
किं च यज्ञस्य यज्ञत्वं क्व च यज्ञः प्रतिष्ठितः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
किं च वामीप्सितं वीरौ मनसः क्षिप्रमुच्यताम् ||
४६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
किं च श्रेष्ठतमं शौचं तन्मे व्रूहि पितामह ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
किं च सर्वे नृपतय़ः सभाय़ां ये समासते |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
कर्ण उवाच
किं चान्यन्मय़ि दुर्वृत्तं येन मां परिगर्हसे |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
किं चाप्यनेन तत्कर्म कृतं पूर्वं सुदुष्करम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
किं चास्य सुकृतेऽस्माभिः प्राप्तव्यमिति शोभनम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
किं चाहमभिधास्यामि वाक्पते तव संनिधौ |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
किं चिकीर्षत्ययं कर्म भीमो भीमपराक्रमः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
किं चिरं कृतमिति ||
१६५ घ
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
किं चैतद्भवता न ज्ञाय़ते यथा ||
१३१ घ
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
किं चैतन्मन्यसे कृच्छ्रमस्माकं पापमादितः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
किं छिद्रं कोऽनुषङ्गो मे किं वास्त्यविनिपातितम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारवन्धनात् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
किं जितं किं जितमिति ह्याकारं नाभ्यरक्षत ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
सेनजिदु उवाच
किं ज्ञानं किं श्रुतं वा ते यत्प्राप्य न विषीदसि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
शुक उवाच
किं तज्ज्ञानमथो विद्या यय़ा निस्तरति द्वय़म् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
किं तत् ||
१६७ ग