शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
युधिष्ठिर उवाच
किं तदक्षरमित्युक्तं यस्मान्नावर्तते पुनः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
किं तदा कुरवः कृत्यं विदधुः कालचोदिताः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
किं तदा न निहंस्येनं भूत्वा पुरुषसत्तमः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
किं तदुत्पादितं पूर्वं हरिणा लोकधारिणा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
किं तदेवार्थसामान्यं छत्रादिषु न लक्ष्यते ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
जनमेजय़ उवाच
किं तद्गुह्यं न चाख्यातं कर्णाय़ेहोष्णरश्मिना |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
अर्जुन उवाच
किं तद्व्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
किं तपो व्रह्मचर्यं वा गोभिः कृतमिहेश्वर |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
किं तवापकृतं तत्र यदि मुक्तोऽसि सर्वतः ||
१६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
किं तवास्मासु कर्तव्यं मा मा स्प्राक्षीः कथञ्चन |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
किं तस्य तपसा कार्यं किं यज्ञेन किमात्मना ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
किं तस्य तपसा कार्यं किं वृत्तेन किमात्मना |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
किं तस्य तपसा राज्ञः किं च तस्याध्वरैरपि |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
धृतराष्ट्र उवाच
किं तस्यां मम सेनाय़ां नासन्केचिन्महारथाः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
किं तिष्ठत यथा मूढाः सर्वे विगतचेतसः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
किं तु कार्यगरीय़स्त्वात्ततस्त्वाहमचूचुदम् ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
किं तु तस्य सुदुर्वुद्धेर्मन्दस्यापनय़ैर्भृशम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
किं तु देवस्य महतः सङ्क्षिप्तार्थपदाक्षरम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
किं तु नात्यद्भुतं तेषां येषां धर्मो व्यपाश्रय़ः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
किं तु नाद्यानुशोचामि तथात्मानं विनाशितम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
किं तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्णं दीय़तामिति ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
किं तु मद्वचनाद्व्रूहि राजानं भरतर्षभम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
किं तु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
किं तु यानि विदुर्लोके व्राह्मणाः शार्ङ्गधन्वनः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
अश्वत्थामो उवाच
किं तु रोषान्वितो जन्तुर्हन्यादात्मानमप्युत ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
जनमेजय़ उवाच
किं तु लघ्वर्थसंय़ुक्तं प्रिय़ाख्यानं न मामति |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
किं तु वासाय़ राष्ट्राणि कीर्तय़िष्यामि कानिचित् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
किं तु वुद्ध्या समो नास्ति मम कश्चिद्वनस्पतिः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
किं तु सङ्क्षेपतः शीलं प्रय़त्ने नेह दुर्लभम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
किं तु सञ्जय़ मे व्रूहि पुनस्तेषां विचेष्टितम् ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
किं तु सम्वन्धकं तुल्यमस्माकं कुरुपाण्डुषु |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
किं तु सर्वापराधोऽय़ं यदि तेऽद्य धनञ्जय़ः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
किं तु सौहृदमेवैतत्कृपय़ा मधुसूदन |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
किं तु स्वेनास्मि सन्तुष्टो दुःखा वृत्तिरनुष्ठिता |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
किं ते जनक्षय़ेणेह कृतेन भरतर्षभ |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
किं ते ज्ञातैर्मूढ महाधनुर्धरै; रनाय़ुष्यं कर्म कृत्वातिघोरम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
जरितो उवाच
किं ते ज्येष्ठे सुते कार्यं किमनन्तरजेन वा |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
किं ते तद्विस्मृतं पार्थ यदेष कुलपांसनः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
किं ते दैववलाच्छापमुत्सृजन्ते न कर्मणा ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
कङ्क उवाच
किं ते द्यूतेन राजेन्द्र वहुदोषेण मानद |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
किं ते धनेन किं वन्धुभिस्ते; किं ते पुत्रैः पुत्रक यो मरिष्यसि |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
किं ते धनैर्वान्धवैर्वापि किं ते; किं ते दारैर्व्राह्मण यो मरिष्यसि |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
किं ते प्रिय़ं करवाणीति |
९३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
किं ते प्रिय़ं करवाणीति ||
१५४ ग
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
किं ते प्रिय़ं करवाण्यद्य वत्से; वधेन मे जीवितं स्यात्कचस्य |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
किं ते प्रिय़ं वै क्रिय़तां महर्षे; दासाः स्म सर्वे तव वाचि वद्धाः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
किं ते प्रिय़मुपहरामि गुर्वर्थमिति ||
९७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
किं ते राज्येन कौन्तेय़ कृत्वेमं ज्ञातिसङ्क्षय़म् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
किं ते राज्येन दुर्धर्ष येन प्राप्तोऽसि किल्विषम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
किं ते विपुल दृष्टं वै तस्मिन्नद्य महावने |
२ क