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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
किं ते विवक्षितं चात्र तदाशु वद माधव ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
किं ते विवक्षय़ा वीर जहि भीष्मं महारथम् |
८२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
अर्जुन उवाच
किं ते व्यवसितं राजन्यदस्मानपहाय़ वै |
११ क
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
किं ते व्यवसितं वीर कौरवाणां विनिग्रहे |
२ क
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
किं ते साह्यं मय़ा कार्यं करिष्याम्यवशोऽपि तत् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
किं ते सुखप्रिय़ेणेह प्रोक्तेन भरतर्षभ |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
किं ते हिडिम्व एतैर्वा सुखसुप्तैः प्रवोधितैः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
किं तेन न कृतं पापं चोरेणात्मापहारिणा ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४१
धृतराष्ट्र उवाच
किं त्वं न वेद तद्भूय़ो यन्मे व्रूय़ात्सनातनः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
किं त्वं नकुल कुर्वाणस्तत्र तात चरिष्यसि |
१ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
किं त्वं मानुष्यकं स्नेहमद्यापि परिकर्षसि ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
किं त्वं मूर्खः प्रभषन्मूढचेता; मामवोचः पौरुषमर्जुनस्य ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
कर्ण उवाच
किं त्वं साक्षाद्धनुर्वेदो रामो वा विप्रसत्तम |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
द्रौपद्यु उवाच
किं त्वतः कृपणं भूय़ो यदहं स्त्री सती शुभा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
किं त्वत्र संविधातव्यं भवतां यद्भवेद्धितम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
किं त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं प्रति भार्गव |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १८३
अत्रिरु उवाच
किं त्वस्ति तत्र द्वेष्टारो निवसन्ति हि मे द्विजाः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
किं त्वस्ति मम सन्देहो गवां लोकं प्रति प्रभो |
४ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
किं त्वस्य सुकृतं कर्म लोका वा के विनिर्जिताः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
अष्टावक्र उवाच
किं त्वस्याः परमं रूपं जीर्णमासीत्कथं पुनः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
किं त्विदं महदाश्चर्यं सम्पश्यामीत्यचिन्तय़त् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
किं त्वेवाहं विह्वलः सम्प्रदृश्य; दिग्भ्यः सर्वास्ता महोल्का इवाग्नेः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
किं त्वय़ा पापकं कर्म कृतं पूर्वं सुदारुणम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
किं तय़ोर्विप्रिय़ं कृत्वा केशवार्जुनय़ोर्मृधे |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
धृतराष्ट्र उवाच
किं दत्तं हुतमिष्टं वा सुतप्तमथ वा तपः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
किं ददानीति तं विप्रमुवाचाधिरथिस्ततः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
किं ददानीति वहुशो गालवः प्रत्यभाषत ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
किं दर्दुरः कूपशय़ो यथेमां; न वुध्यसे राजचमूं समेताम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
युधिष्ठिर उवाच
किं दानं किं फलं चैव कस्माच्च परमुच्यते ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
अष्टावक्र उवाच
किं द्रष्टव्यं मय़ा तत्र वक्तुमर्हति मे भवान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १७८
युधिष्ठिर उवाच
किं न गृह्णासि विषय़ान्युगपत्त्वं महामते |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
दुर्योधन उवाच
किं न पश्यसि मां पाप गदाय़ुद्धे व्यवस्थितम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ८१
ऋषिरु उवाच
किं न पश्यसि मे देव कराच्छाकरसं स्रुतम् |
१०४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
किं न पश्यसि मे व्रह्मन्कराच्छाकरसं स्रुतम् |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
किं न विज्ञातमेतन्मे यदर्जुनमवोचथाः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
किं न वै क्षत्रिय़हरो हरतुल्यपराक्रमः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
किं नः सम्प्रेक्षमाणानां मद्राणां हन्यते वलम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
किं नदध्वमधर्मज्ञाः पार्थे वै दृश्यतां वलम् ||
५६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
किं नाम तद्भवेत्कर्म येन त्वानुव्रजेम वै ||
४० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
किं नाम दुःखं लोकेऽस्मिन्पितुर्वधमनुस्मरन् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
किं नाम पतनं काक यत्त्वं पतसि साम्प्रतम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
किं नाम लोकेष्वविषह्यमस्ति; कृष्णस्य सर्वेषु सदैवतेषु |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
किं नाम वक्ष्यत्यवनिप्रधानः; पितॄन्समागम्य परत्र पापः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
किं निश्चितं भवेत्तत्र तन्मे व्रूहि पितामह ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
किं निय़म्य न शोचन्ति कैश्च सन्धिर्न जीर्यते ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
किं नु कर्म स्वभावोऽय़ं ज्ञानं कर्मेति वा पुनः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु कर्माशुभं पूर्वं कृतवत्यस्मि जन्मनि |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
किं नु कार्यं कथं कुर्यां क्व नु गच्छामि सञ्जय़ |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु कृत्वा कृतं कार्यं भवेदिति च विह्वला ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
किं नु कृत्वा कृतं मे स्याद्व्रूहि माधव माचिरम् |
१६ क