शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
किं नु खल्वसि मूढस्त्वं शोच्यः किमनुशोचसि |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
किं नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्विभेदास्य लोचने |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
किं नु गर्हाम्यथात्मानमथ भीष्मं दुरासदम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
किं नु चित्रमतस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
किं नु जीवितसामर्थ्यमिति विद्धि समागतम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
किं नु ज्याय़स्तरं लोके महत्त्वात्प्रतिभाति वः |
३१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु तत्कलुषं कर्म कृतमेभिर्महात्मभिः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
किं नु तत्कारणं मन्ये येनाहं भवतः प्रिय़ः |
१५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
किं नु तत्कारणं येन साद्यापि न निवर्तते ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
किं नु तत्कारणं व्रह्मन्येन कृष्णो गतः पुनः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
किं नु तत्पातकं न स्यात्तद्वा दत्तं वृथा भवेत् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
रुद्र उवाच
किं नु तत्सदनं श्रेष्ठं क्षुत्पिपासाविवर्जितम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु तद्दुष्कृतं कर्म मय़ा कृतमजानता |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
जनमेजय़ उवाच
किं नु तद्विदुषां श्रेष्ठ कर्णं प्रति महद्भय़म् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
किं नु तद्विस्मृतं शक्र न तन्मनसि ते स्थितम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
किं नु तस्य मय़ा कार्यमपराद्धं महीपतेः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
किं नु तस्य शरीरेऽस्ति सर्वलक्षणपूजिते |
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु तस्य सुखं न स्यादाश्रमे यो धनञ्जय़म् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
किं नु तस्याजितं सङ्ख्ये भ्राता यस्य धनञ्जय़ः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
११७
राम उवाच
किं नु ते तत्र वक्ष्यन्ति सचिवेषु सुहृत्सु च |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
किं नु ते मनसा ध्यातमशुभं धर्मदूषणम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
पुत्र उवाच
किं नु ते मामपश्यन्त्याः पृथिव्या अपि सर्वय़ा |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
किं नु ते मामपश्यन्त्याः पृथिव्या अपि सर्वय़ा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
किं नु ते मारुतस्तात प्रीतिमानथ वा सुहृत् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु तेन कृतं कर्म तथाय़ुक्तं नरर्षभ |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
किं नु तैरजितं सङ्ख्ये येषां पक्षे च सात्यकिः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
११७
राम उवाच
किं नु तैर्न कृतं पापं यैर्भवांस्तपसि स्थितः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गौरु उवाच
किं नु त्यक्तास्मि भगवन्यदेवं मां प्रभाषसे |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
किं नु त्वं तैर्न वै श्रेय़ांस्तुल्यो वा वुद्धिपौरुषैः ||
२४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
किं नु दुःखतरं कृष्ण परं मम भविष्यति |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु दुःखतरं शक्यं मय़ा द्रष्टुमतः परम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
किं नु दुःखमतोऽन्यद्वै यदहं श्रमकर्शितः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
किं नु दुर्योधनः कृत्यं कर्णः कृत्यं किमव्रवीत् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
किं नु दुर्योधनः कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
किं नु दुर्योधनैवं मां वाक्षल्यैरुपविध्यसि |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
किं नु दुश्चरितं यज्ञे दिदृक्षुः सा रसातलम् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु नाद्य कृतं तावत्सर्वेषां नः परं प्रिय़म् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
लिखित उवाच
किं नु नाहं त्वय़ा पूतः पूर्वमेव महाद्युते |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
दुर्योधन उवाच
किं नु नो विद्यते कृत्यं धनेन धनलिप्सय़ा |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
किं नु पश्यसि वाणौघान्क्रोशमात्रे किरीटिनः |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
किं नु पार्थोऽर्जुनः साक्षादय़मस्मान्प्रवाधते ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
किं नु पूर्वं ततो देवी व्याजहार सरस्वती ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
द्रौपद्यु उवाच
किं नु पूर्वं पराजैषीरात्मानं मां नु भारत |
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु पूर्वं पराजैषीरात्मानमथ वापि माम् ||
८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु पूर्वमय़ं वालो गौरवादभ्युपैष्यति |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
किं नु प्राप्स्यामहे कृष्ण हत्वा ज्ञातीन्समागतान् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
किं नु मां मन्यसे पार्थ सुखितेति परन्तप |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१३८
लोमश उवाच
किं नु मे नाग्नय़ः शूद्र प्रतिनन्दन्ति दर्शनम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
किं नु मे मरणं श्रेय़ः परित्यागो जनस्य वा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
किं नु मे सुकृतं भूय़ाद्भर्तुरुत्थापनं न वा |
१५ क