शान्ति पर्व
अध्याय
३४१
भीष्म उवाच
किं नु मे स्याच्छुभं कृत्वा किं क्षमं किं पराय़णम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु मे स्यात्कृतं कृत्वा मन्यध्वं पुत्रकाः कथम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
किं नु मे हृदय़ं त्रस्तं वाक्यं सज्जति केशव |
४ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे वाणाः क्षय़ं गताः |
३७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु राज्येन ते कार्यं पितॄन्भ्रातॄनपश्यतः |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
किं नु राज्येन वै कार्यं विहीनाय़ाः सुतैर्मम ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
किं नु राधेय़ वाचा ते कर्म तत्स्मर्तुमर्हसि |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु वक्ष्यति धर्मज्ञ इति साचीकृताननाः ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु वक्ष्यति धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
किं नु वक्ष्यति राजासौ किं भीष्मः प्रतिवक्ष्यति |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
किं नु वक्ष्यति वार्ष्णेय़ी वधूर्मे मधुसूदनम् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु वक्ष्यति वीभत्सुरजितो युधि पाण्डवः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
किं नु वक्ष्यति सम्राण्मां वर्णकः सुकृतो न वा |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
किं नु वक्ष्यन्ति ते क्षात्रं सैन्यमध्ये पराजिताः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
किं नु वक्ष्यसि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
किं नु वक्ष्यसि संसत्सु कथासु च जनार्दन |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
किं नु वन्धुविहीनस्य जीवितेन ममाद्य वै |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु विद्यावलं किं वा वरदानमथो तव |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
किं नु व्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्च वलभित्प्रभुः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं कार्यं यदिदमुद्यतम् |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं गुरुदाराभिरक्षणे |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं यत्कालो दुरतिक्रमः |
७९ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं यत्त्वमद्यापि मानुषम् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं यदहं तत्र नाभवम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं यद्राजा सततं घृणी |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु शोचति भर्तारं पुत्रं चैषा मनस्विनी |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
किं नु श्रेय़ः पुरुषस्येह भद्रे; कथं कुर्वन्न च्यवते स्वधर्मात् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
किं नु श्रेय़स्करं कर्म भवेदिति विचिन्तय़न् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
किं नु संशप्तकान्हन्मि स्वान्रक्षाम्यहितार्दितान् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
किं नु सञ्जय़ सङ्ग्रामे वृत्तं दुर्योधनं प्रति |
५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु सुप्तोऽस्मि जागर्मि चेतय़ानो न चेतय़े |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
किं नु स्याच्छाश्वतं स्थानमल्पक्लेशं महोदय़म् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु स्यादधिकं तस्माद्यदहं द्रुपदात्मजाम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
किं नु स्यान्मातलिरय़ं देवराजस्य सारथिः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
किं नु स्वप्नो मय़ा दृष्टः कोऽय़ं विधिरिहाभवत् |
९३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
किं नु स्वित्कुरवोऽकार्षुर्निमग्नाः शोकसागरे ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु स्विदेतत्पततीति सर्वे; वितर्कय़न्तः परिमोहिताः स्मः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
किं नु स्विद्धिमवान्भिन्नः किं नु स्विद्दीर्यते मही |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं नु हित्वा प्रिय़ो भवति किं नु हित्वा न शोचति |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं नु हित्वार्थवान्भवति किं नु हित्वा सुखी भवेत् ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
किं नैव जातु पुरुषः परेषां प्रेष्यतामिय़ात् ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
किं नो गावः करिष्यन्ति धनं वा विपुलं तथा |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
किं नो मांसेन शुष्केण परिक्लिष्टेन शोषिणा ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
भीम उवाच
किं नो विवदितेनेह किं नः क्लेशेन भारत |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
किं न्वतः परमं दुःखं यद्वय़ं स्वर्गते त्वय़ि |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
युधिष्ठिर उवाच
किं न्वतः परमं स्वर्ग्यं का न्वतः प्रीतिरुत्तमा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
युधिष्ठिर उवाच
किं न्वतः परमैश्वर्यं व्रूहि मे यदि मन्यसे ||
३३ ख