chevron_left  किंarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
किं भवत्यै प्रय़च्छामि गुर्वर्थं विनिय़ुङ्क्ष्व माम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ४
महाभारत कथा
किं भवन्तः श्रोतुमिच्छन्ति |
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
किं भीमः समरश्लाघी किं नु कृष्णार्जुनाविति ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
किं भूय़ः कथ्यतां वीर किं ते हृदि विवक्षितम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
साध्या ऊचुः
किं मन्यसे श्रेष्ठतमं द्विज त्वं; कस्मिन्मनस्ते रमते महात्मन् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
मतङ्ग उवाच
किं मां तुदसि दुःखार्तं मृतं मारय़से च माम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
किं मां वक्ष्यन्ति किं चापि प्रतिवक्ष्यामि तानहम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
किं मां विलपतीमेकां पर्वतश्रेष्ठ दुःखिताम् |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय १३
द्रौपद्यु उवाच
किं मातुरङ्के शय़ितो यथा शिशु; श्चन्द्रं जिघृक्षुरिव मन्यसे हि माम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
किं मात्यवाक्षीः परुषैर्व्रणं सूच्या इवानघ |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
किं मृषोक्तेन वहुना कर्मणा तु समाचर |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३७
शृङ्ग्यु उवाच
किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः |
४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
किं मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमाः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
किं मे राज्येन भोगैर्वा किं यज्ञैः किं सुखेन वा |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
किं मय़ा कृतमित्युक्त्वा निपपात महीतले ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
किं मय़ा कृतमेतावद्योऽहं कालमिमं जनम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय २२०
वैशम्पाय़न उवाच
किं मय़ा न कृतं तत्र यस्येदं कर्मणः फलम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
किं मय़ा मनसा ध्यातमशुभं धर्मदूषणम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
युधिष्ठिर उवाच
किं यज्ञविधिरेवैष किमेतज्जप्यमुच्यते |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
किं राजभिरिहानीतैरवमानाय़ भारत ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
किं राज्ञः सर्वकृत्यानां गरीय़ः स्यात्पितामह |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
किं रोदिषि |
३ ख
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
किं रोदिषि त्वं पतिता धरण्यां; किं ते मुखं शुष्यति दीनवर्णम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
किं वक्ष्यति महावाहुर्वलदेवः समागतः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
किं वक्ष्यति शिनेर्नप्ता नरसिंहो महाधनुः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय १६
वृहद्रथ उवाच
किं वरेणाल्पभाग्यस्य किं राज्येनाप्रजस्य मे ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
किं वलं परमं तुभ्यं किं श्रुतं किं पराय़णम् |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
किं वा त्वं तात कुर्वाणः प्रच्छन्नो विचरिष्यसि ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
किं वा त्वं मन्यसे प्राप्तमस्मिन्काले समुत्थिते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
वृत्र उवाच
किं वा फलं परं प्राप्य जीवस्तिष्ठति शाश्वतः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
युधिष्ठिर उवाच
किं वा भक्ष्यमभक्ष्यं वा सर्वमेतद्वदस्व मे ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
किं वा भगवतां कार्यमहं किं करवाणि वः |
६४ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
युधिष्ठिर उवाच
किं वा भवान्मन्यते युक्तरूपं; भवद्वाक्ये सर्व एव स्थिताः स्म ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २९४
जनमेजय़ उवाच
किं वाकार्षुर्द्वादशेऽव्दे व्यतीते; तन्मे सर्वं भगवान्व्याकरोतु ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
किं वाचा वहुनोक्तेन कत्थितेन च दुर्मते |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
वासुदेव उवाच
किं वाच्याः पाण्डवेय़ास्ते भवत्या वचनान्मय़ा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
किं वापि पूर्वं जागर्ति किं वा परममुच्यते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ८
शकुनिरु उवाच
किं वालिषां मतिं राजन्नास्थितोऽसि विशां पते |
७ क
वन पर्व
अध्याय २९६
यक्ष उवाच
किं विघातेन ते पार्थ प्रश्नानुक्त्वा ततः पिव |
३० क
वन पर्व
अध्याय १३५
इन्द्र उवाच
किं विघातेन ते विप्र गच्छाधीहि गुरोर्मुखात् ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
भीम उवाच
किं विद्विषो वाद्य मां धारय़ेय़ु; र्नादेवीस्त्वं यद्यनय़ा नरेन्द्र ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
किं वेदय़ति वा जीवः किं शृणोति व्रवीति वा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
किं वै तूष्णीं ध्याय़सि सृञ्जय़ त्वं; न मे राजन्वाचमिमां शृणोषि |
१३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
धृतराष्ट्र उवाच
किं वै भीमस्तदाकार्षीत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
प्रह्राद उवाच
किं वै सहैव चरतो न पुरा चरतः सह |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्रह्मो उवाच
किं वो भय़ं मानुषेभ्यो यूय़ं सर्वे यदामराः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
किं वो मुखमनीकानामासीत्सञ्जय़ भागशः ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
युधिष्ठिर उवाच
किं व्रह्मा न विजानीते यतः शुश्राव नारदात् ||
१०२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
किं व्राह्मणवलेन त्वमतिमात्रं प्रवर्तसे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
केशिन्यु उवाच
किं व्राह्मणाः स्विच्छ्रेय़ांसो दितिजाः स्विद्विरोचन |
६ क