वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं व्राह्मणानां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
साध्या ऊचुः
किं व्राह्मणानां देवत्वं किं च साधुत्वमुच्यते |
४३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
किं वय़ं कारिताः पूर्वं भवत्या पृथिवीक्षय़म् |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
किं शोचसि महाराज नास्ति शोके सहाय़ता |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
भीष्म उवाच
किं श्रेय़ः का गतिर्व्रह्मन्किं कृतं न विनश्यति |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
सगर उवाच
किं श्रेय़ः परमं व्रह्मन्कृत्वेह सुखमश्नुते |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
युधिष्ठिर उवाच
किं श्रेय़ः पुरुषस्येह किं कुर्वन्सुखमेधते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
युधिष्ठिर उवाच
किं श्रेय़ः प्रतिपद्येत तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
किं श्रेय़ः सर्वभूतानामस्मिँल्लोके परत्र च |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
किं स वक्ष्यति दुर्धर्षः समेत्य परलोकजित् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
शिष्य उवाच
किं सत्यं किं तपो विप्र के गुणाः सद्भिरीरिताः |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
युधिष्ठिर उवाच
किं सुवर्णं कथं जातं कस्मिन्काले किमात्मकम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
शौनक उवाच
किं सूत तेषां विप्राणां मन्त्रग्रामो मनीषिणाम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
किं सौम्य नाभित्वरसे किं कृतार्थोऽवमन्यसे |
८६ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विच्छीघ्रतरं वाय़ोः किं स्विद्वहुतरं नृणाम् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
किं स्वित्कृत्वा लभते तात लोका; न्मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया वा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्वित्प्रतिष्ठमानानां किं स्वित्प्रवदतां वरम् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्वित्प्रवसतो मित्रं किं स्विन्मित्रं गृहे सतः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
किं स्वित्प्रहरणं श्रेष्ठं सर्वय़ुद्धेषु पार्थिव ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
किं स्वित्सत्यं किमनृतं किं स्विद्धर्म्यं सनातनम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्वित्सुप्तं न निमिषति किं स्विज्जातं न चोपति |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
राजो उवाच
किं स्वित्सुप्तं न निमिषति किं स्विज्जातं न चोपति |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विदात्मा मनुष्यस्य किं स्विद्दैवकृतः सखा |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विदादित्यमुन्नय़ति के च तस्याभितश्चराः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विदापततां श्रेष्ठं किं स्विन्निपततां वरम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
किं स्विदापूर्यते व्योम जलभारघनैर्घनैः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
दुर्योधन उवाच
किं स्विदिच्छति कौन्तेय़ो युद्धप्रेप्सुर्युधिष्ठिरः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विदेकपदं धर्म्यं किं स्विदेकपदं यशः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
शक्र उवाच
किं स्विदेकपदं व्रह्मन्पुरुषः सम्यगाचरन् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विदेकपदं स्वर्ग्यं किं स्विदेकपदं सुखम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विदेको विचरति जातः को जाय़ते पुनः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
किं स्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेय़तमं मतम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
युधिष्ठिर उवाच
किं स्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेय़तमं मतम् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
किं स्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेय़तमं स्मृतम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विद्गुरुतरं भूमेः किं स्विदुच्चतरं च खात् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
युधिष्ठिर उवाच
किं स्विद्दत्तं पितृभ्यो वै भवत्यक्षय़मीश्वर |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
किं स्विद्धिमस्य भैषज्यं किं स्विदावपनं महत् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
युधिष्ठिर उवाच
किं स्विद्वहुगुणं प्रेत्य किं वा दुष्करमुच्यते ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
किं स्विद्वय़मपेतार्थमश्लिष्टमसमञ्जसम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
युधिष्ठिर उवाच
किं स्विन्निःश्रेय़सं तात तन्मे व्रूहि पितामह ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
युधिष्ठिर उवाच
किं हविश्चिररात्राय़ किमानन्त्याय़ कल्पते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
किं हि कृत्वा त्वमिन्द्रोऽद्य किं हि कृत्वा च्युता वय़म् |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
किं हि वित्तेन नः कार्यं स्वर्गेप्सूनां द्विजर्षभ ||
१७ ग
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
किं हि शक्यं मय़ा कर्तुं यद्वृद्धानां त्वय़ा नृप |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
किं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
किं हीय़ते मनुष्यस्य मन्दस्यापि हि जीवतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
किं ह्यभ्यधिकमेतस्माद्यदापन्नः सुय़ोधनः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
किंनरा नाम गन्धर्वा नरा नाम तथापरे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
किंनराणां समूहैश्च भृङ्गराजैस्तथैव च ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
किंनराश्च समुद्विग्नाः शक्तिपातरवोद्धताः ||
७७ ख