आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
कटाक्षैर्निर्दहन्तीव तिर्यग्राजानमैक्षत ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
कटुकां ये न भाषन्ते परुषां निष्ठुरां गिरम् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
कठिनं पूरय़ामास ततः काष्ठान्यपाटय़त् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छलो मृदुदारुणः |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो दारुणो मृदुः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
कठिनस्त्वपरो विन्दुः कैटभो राजसस्तु सः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
कठिनानि समादाय़ चीराजिनजटाधराः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
कडङ्गद्वारकाणि स्युरुच्छ्वासार्थे पुरस्य ह |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
कणपिण्याककुल्माषशाकय़ावकसक्तवः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
कणानां भक्षणे युक्तः पिण्याकस्य च भक्षणे |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
कणान्कदाचित्खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
कणिङ्कमुपसङ्गम्य पप्रच्छार्थविनिश्चय़म् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
युधिष्ठिर उवाच
कण्टकान्कूपमग्निं च वर्जय़न्ति यथा नराः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
कण्टकोऽपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम् ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
कण्ठत्राणेन च वभौ सेन्द्राय़ुध इवाम्वुदः ||
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
कण्ठसूत्राङ्गदानां च केय़ूराणां च मारिष ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
श्रीकृष्ण उवाच
कण्ठसूत्रैरङ्गदैश्च निष्कैरपि च सुप्रभैः |
३६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
कण्ठान्तरगतान्हारानाक्षिपन्ति सहस्रशः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
कण्ठे गृहीत्वा प्राक्रोशत्पृथा पार्थाननुस्मरन् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
कण्ठे चैनं परिष्वज्य गम्यतामित्युवाच ह ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
कण्ठे जग्राह देवेन्द्रं सुलग्ना चाभवत्तदा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
कण्डरीकोऽथ राजा च व्रह्मदत्तः प्रतापवान् |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कण्डूतिः कालिका चैव देवमित्रा च भारत ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
कण्वं हि पितरं मन्ये पितरं स्वमजानती |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
कण्वष्याहं भगवतो दुःषन्त दुहिता मता |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
कण्वाश्रमं समासाद्य श्रीजुष्टं लोकपूजितम् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
कण्वोऽथ देवहोत्रश्च एते षोडश कीर्तिताः |
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
कतमं यास्यसेऽनीकमुक्तो यास्याम्यहं त्वय़ा ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
कतमद्द्वैरथं युद्धं यत्राजैषीर्धनञ्जय़म् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
कतमद्यास्यसेऽनीकमुक्तो यास्याम्यहं त्वय़ा ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
कतमेन पथा याता भगवन्वहवो जनाः |
४४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
विराट उवाच
कतमोऽस्यार्जुनो भ्राता भीमश्च कतमो वली ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
अष्टक उवाच
कतरस्त्वेतय़ोः पूर्वं देवानामेति सात्म्यताम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
कतरेण पथा याता दस्यवो द्विजसत्तम |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
अष्टक उवाच
कति स्विदेव मुनय़ो मौनानि कति चाप्युत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
भीष्म उवाच
कतीन्द्रिय़ाणि विप्रर्षे कति प्रकृतय़ः स्मृताः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२३६
जनमेजय़ उवाच
कत्थनस्यावलिप्तस्य गर्वितस्य च नित्यशः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
अर्जुन उवाच
कत्थमानोऽभिनिर्याय़ किमर्थं न युय़ुत्ससे ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
कथं कथाभवत्तीव्रा दृष्ट्वा तद्व्याकुलं महत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
कथं कपोतेन पुरा शत्रुः शरणमागतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
कथं करिष्याम्यधना महर्षे; मासश्चाय़ं दशमो वर्तते मे |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
कथं कर्णं युधां श्रेष्ठं भीमोऽय़ुध्यत संय़ुगे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
देवा ऊचुः
कथं कर्तव्यमस्माभिर्भगवंस्तद्वदस्व नः ||
७७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
कथं कर्म क्रिय़ात्साधु कथं मुच्येत किल्विषात् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
कथं कर्म विना दैवं स्थास्यते स्थापय़िष्यति ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
कथं कर्म शुभं कुर्यां कथं मुच्ये पराभवात् |
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
काश्यप उवाच
कथं कष्टाच्च संसारात्संसरन्परिमुच्यते ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
याज उवाच
कथं कामं न सन्दध्यात्सा त्वं विप्रैहि तिष्ठ वा ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
युधिष्ठिर उवाच
कथं कार्यं परीक्षेत शीघ्रं वाथ चिरेण वा |
१ क