द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
स सात्यकिं त्रिभिर्वाणैरष्टभिश्च वृकोदरम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
स सात्यकिं पुनः क्रुद्धः केकय़ानां महारथः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
स सात्यकेः प्रचिच्छेद क्षुरप्रेण महद्धनुः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
स सात्यकेराशु वचो निशम्य; रथोत्तमं काञ्चनभूषिताङ्गम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
स सात्यकेस्तु वलिनः कर्णस्य च महात्मनः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
स सात्वत्यामतिरथः सम्वभूव धनञ्जय़ात् |
६१ क
विराट पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स साधु कौन्तेय़ इतो वासमर्जुन रोचय़ |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
स साधय़ति कृत्यानि शत्रूंश्चैवाधितिष्ठति ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
स सानुवन्धः ससुहृद्गणश्च; सौभस्य सौभाधिपतेश्च मार्गम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
स सामाजजनः सर्वो निश्चलः स्थिरलोचनः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
स साम्राज्यं जरासन्धः प्राप्तो भवति योनितः ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स साय़कमय़ैर्जालैः सर्वतस्तान्महारथान् |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
स साय़कमय़ैर्जालैरर्जुनस्य रथं प्रति |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
स साय़कमय़ैर्जालैर्भीमः कर्णरथं प्रति |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
स साय़कस्तिग्मतेजा विसृष्टः; श्रुत्वा दलस्तच्च वाक्यं वभाषे ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
स साय़कान्द्विजो विद्ध्वा रेणुकामिदमव्रवीत् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
स सिंह इव मातङ्गं यूथर्षभ इवर्षभम् |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
स सिंह इव मातङ्गं विकर्षन्भूरिदक्षिणः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
स सिंहदंष्ट्रो जानुभ्यामापन्नोऽमितविक्रमः |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स सिंहनादान्विननाद कौरवो; निपात्य भूमौ युधि भीममोजसा |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
स सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स सिद्धमार्गमाक्रम्य कुरुपाण्डवसत्तमः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
स सिद्धिमन्तं रथमुत्तमं दृढं; सकूवरं हेमपरिष्कृतं शुभम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
स सिद्धैः साध्यते नित्यं व्राह्मणैर्निय़तात्मभिः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
स सुखं मोदते भूप इह लोके परत्र च ||
१०४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
स सुखान्यनुभूय़ेह शिष्टानां गतिमाप्नुय़ात् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
स सुखी सर्वसिद्धार्थः स्वर्गलोकमिय़ान्नरः ||
५४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स सुनाभं सहस्रारं वज्रनाभमय़स्मय़म् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
स सुप्त एव चण्डालः श्लेष्मापिहितलोचनः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
स सुप्तां मातरं दृष्ट्वा भ्रातृंश्च वसुधातले |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
स सुहृच्छोकदो भूत्वा शत्रूणां हर्षवर्धनः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
स सुहृत्क्रोधनो लुव्धो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
स सुहृत्तादृशो राज्ञो न मन्त्रं श्रोतुमर्हति ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
स सुहृद्भिरमात्यैश्च भ्रातृभिः स्वजनेन च |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स सूतमव्रवीत्क्रुद्धः सूतपुत्राय़ मा वह ||
८८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
स सूतश्चोदितो राज्ञा राज्ञः स्यन्दनमुत्तमम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
स सूतो भार्यया सार्धं विस्मय़ोत्फुल्ललोचनः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
स सूदरूपः परमेण वर्चसा; रविर्यथा लोकमिमं प्रभासय़न् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
स सूर्यस्याभितो याति वैनतेय़ो विहङ्गमः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
स सृञ्जय़ानां सर्वेषां पाञ्चालानां च पश्यताम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
स सृष्ट्वा पृथिवीं देवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
स सेनापतिरेवाथ वभौ स्कन्दः प्रतापवान् |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
स सोम इह सौभद्रो योगादेवाभवद्द्विधा ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
स सोमदत्तः कुशली तात कच्चि; द्भूरिश्रवाः सत्यसन्धः शलश्च |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
स सौमदत्तेस्त्वरितश्छित्त्वेष्वसनकेतने |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स सौवलं समानाय़्य कर्णदुःशासनावपि |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
स सौवलमभिद्रुत्य गृध्रपत्रैः शिलाशितैः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
स सौवलेन सहितस्तथा दुःशासनेन च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
स स्त्रीगणवृतो राजा प्रहृष्टः प्रददौ वसु |
९ क