विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
किञ्चिदस्य यथा पुंसः किञ्चिदस्य यथा स्त्रिय़ः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
किञ्चिदागतसंरम्भो विश्वामित्रोऽव्रवीदिदम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
किञ्चिदुन्नाम्य वदनं प्राञ्जलिर्वाक्यमव्रवीत् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
किञ्चिदेव निमित्तं च भवत्यत्र क्षय़ावहम् ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
किञ्चिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
किञ्चिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
किञ्चिद्दीनमना भीष्ममिति होवाच केशवः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
किञ्चिद्दैवाद्धठात्किञ्चित्किञ्चिदेव स्वकर्मतः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
किञ्चिद्दैवाद्धठात्किञ्चित्किञ्चिदेव स्वकर्मभिः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
किञ्चिद्विचलितः कर्णः सुप्रहाराभिपीडितः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
किञ्चिद्व्यापद्यते तत्र यत्राहमपि च ध्रुवम् ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
कितवं मम पुत्राणां विनाशाय़ोपशिक्षितम् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
कितवस्याप्यनिकृतेर्वृत्तमेतन्न पूज्यते ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
शकुनिरु उवाच
कितवा यानि दीव्यन्तः प्रलपन्त्युत्कटा इव ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
कितवो भ्रूणहा यक्ष्मी पशुपालो निराकृतिः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
किन्दत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय़ च |
८३ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
किन्दाने च नरः स्नात्वा किञ्जप्ये च महीपते |
६५ क
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
किन्द्रव्यास्ताः सभा व्रह्मन्किंविस्ताराः किमाय़ताः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
किमकार्षुः परं तात कुरवः कालचोदिताः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
जनमेजय़ उवाच
किमकार्षुर्वने तस्मिंस्तन्ममाख्यातुमर्हसि ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
जनमेजय़ उवाच
किमकुर्वन्कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
जनमेजय़ उवाच
किमकुर्वन्त कुरवः कालेनाभिप्रचोदिताः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
धृतराष्ट्र उवाच
किमकुर्वन्त कुरवस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
किमकुर्वन्त कौरव्या मम पूर्वपितामहाः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
धृतराष्ट्र उवाच
किमकुर्वन्त मे मन्दाः पुत्रा दुर्योधनादय़ः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
तार्क्ष्य उवाच
किमग्निहोत्रस्य व्रतं पुराण; माचक्ष्व मे पृच्छतश्चारुरूपे |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
किमङ्ग पुनरेकं वै तस्मात्पात्रं समाचरेत् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
किमङ्ग पुनरेकेन फल्गुनेन जिघांसता |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
किमङ्ग पुनरेवान्यो मर्त्यः सत्यं व्रवीमि वः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
धृतराष्ट्र उवाच
किमचेष्टत गाङ्गेय़ो महावुद्धिपराक्रमः ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
जनमेजय़ उवाच
किमचेष्टत विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
किमचेष्टत विप्रर्षे हते पितरि वीर्यवान् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
जनमेजय़ उवाच
किमतः पूर्वजं जन्म व्यासस्यामिततेजसः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
किमत्र कार्यं पार्थस्य कथं वा स प्रशस्यते |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
किमत्र चित्रं यद्वीर मोक्षितः पाण्डवैरसि |
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
किमत्र तथ्यं सुश्रोणि किं मिथ्या व्रूहि शोभने |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
किमत्र प्रत्यक्षतमं भवन्तो यदुपासते |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
किमत्र प्रय़ोजनं वर्तत इति ||
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
किमत्र व्रह्मण्यमृतं किं च वेद्यमनुत्तमम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
किमद्भुततरं लोके भविताप्यथ वाप्यभूत् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
मातो उवाच
किमद्यकानां ये लोका द्विषन्तस्तानवाप्नुय़ुः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
किमधिष्ठाय़ तद्व्रूय़ाल्लोकय़ात्राविनिश्चय़म् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
किमनुक्रोशवैफल्यमुत्पादय़सि मेऽनघ |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
किमनेन गृहीतेन नानेनार्थोऽस्ति जीवता ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
अर्जुन उवाच
किमनेन चिरं भीम जीवता पापरक्षसा |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
किमनेनातिनुन्नेन वाग्भिः काष्ठसधर्मणा ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
किमन्नजातमिष्टं ते किमुपस्थापय़ाम्यहम् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
किमन्यत्कालय़ोगाद्धि दिष्टमेव पराय़णम् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
किमन्यत्क्रोधलोभाभ्यां युध्यामि त्वाद्य सात्वत ||
२५ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
किमन्यत्र विषय़ादीश्वराणां; यत्र पार्थः परलोकं ददर्श |
२२ क