chevron_left  अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३६
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२० क
सभा पर्व
अध्याय ६१
विदुर उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
५८ क
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २०७
मार्कण्डेय़ उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा देवैरुदाहृताः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथाः सत्यवता कृताः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
अत्राप्युपेक्षां कुर्वीत ज्ञात्वा कर्मफलं जगत् ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
अत्राभिलिखितान्याहुः सर्वभूतानि कर्मणा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
अत्रामृतं सुरैः पीत्वा निहितं निहतारिभिः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्रावृत्तो दिनकरः क्षरते सुरसं पय़ः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
अत्रासुरोऽग्निः सततं दीप्यते वारिभोजनः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रास्य विधिवद्यज्ञाः सर्वे वृत्ताः सनातनाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
अत्राह को न्वय़ं भावः स्वप्ने विषय़वानिव |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
अत्राहं गालव पुरा क्षुधार्तः परिचिन्तय़न् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
अत्राहिताः कृतघ्नाश्च मानुषाश्चासुराश्च ये |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
अत्राय़ं क्षेमदर्शीय़मितिहासोऽनुगीय़ते |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
अत्रिः क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमव्रवीत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अत्रिः पुत्रान्स्रष्टुकामस्तानेवात्मन्यधारय़त् |
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
अत्रिणा त्वथ सोमत्वं कृतमुत्तमतेजसा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
अत्रिणा दह्यमानांस्तान्दृष्ट्वा देवा महासुरान् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रिर्धीमान्विप्रमुख्यो वभूव; होता यस्मिन्क्रतुमुख्ये महात्मा ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
अत्रिर्वसिष्ठः शक्तिश्च पाराशर्यश्च वीर्यवान् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रिर्वसिष्ठोऽथ भृगुः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
अत्रिवंशसमुत्पन्नो व्रह्मय़ोनिः सनातनः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
अत्रेः पुत्रश्च धर्मात्मा तथा सारस्वतः प्रभुः ||
३५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
अत्रेः पुत्रश्च भगवांस्तथा सारस्वतः प्रभुः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
अत्रेः पुत्रोऽभवत्सोमः सोमस्य तु वुधः स्मृतः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २५
अर्जुन उवाच
अत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचय़े |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
अत्रेर्भार्यापि भर्तारं सन्त्यज्य व्रह्मवादिनी |
६५ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
अत्रेश्चाप्यन्वय़े जाता व्रह्मणो मानसाः प्रजाः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रेस्तु वहवः पुत्राः श्रूय़न्ते मनुजाधिप |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
अत्रेस्तु सुमहाभागं पुत्रं पुत्रवतां वरम् |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अत्रैकः प्राप्तकालज्ञो दीर्घदर्शी तथापरः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
व्रह्मो उवाच
अत्रैकाग्रेण मनसा पुरुषश्चिन्त्यते विराट् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
अत्रैतच्छम्वरस्याहुर्महामाय़स्य दर्शनम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
कामन्द उवाच
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य च निवर्हणम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३२
भीष्म उवाच
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिमोक्षणे |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
अत्रैतद्वचनं प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
अत्रैव कीर्त्यते सद्भिर्व्राह्मणस्वाभिमर्शने |
१ क
वन पर्व
अध्याय १८४
मार्कण्डेय़ उवाच
अत्रैव च सरस्वत्या गीतं परपुरञ्जय़ |
१ क