वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
सा निय़ुक्ता पितुर्गेहे देवतातिथिपूजने |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
सा नूनं वृहती गौरी सूक्ष्मकम्वलवासिनी |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
सा न्यवारय़दव्यग्रा तं पुत्रं युद्धदुर्मदम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
सा न्याय़्यात्मवता नित्यं त्वद्विधेनाभिवर्तितुम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
सा पपात गदा भूमौ भारद्वाजेन सादिता |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सा पपात तदा छिन्ना प्रतिविन्ध्यशरैः शितैः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
सा पपात तदा भूमौ महोल्केव हतप्रभा ||
१२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सा पपात त्रिधा छिन्ना भूमौ कनकभूषणा |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सा पपात परिच्छिन्ना सङ्क्रुद्धेन किरीटिना |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
सा पाण्डवान्कोपपरीतदेहा; न्सन्दीपय़ामास कटाक्षपातैः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
सा पाण्डवेन प्रहिता वाह्लीकस्य शिरोऽहरत् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
सा पाण्डुपुत्रस्य शरैर्दार्यमाणा महाचमूः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
सा पात्यमाना मोहेन वाहुभ्यामसितेक्षणा |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
सा पार्थिवशताकीर्णा समितिर्भीष्मशोभिता |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सा पित्रा दीय़मानापि भर्त्रे नैच्छदनिन्दिता |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
सा पीड्यमाना कर्णेन पाञ्चालानां महाचमूः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
सा पीत्वा मदिरां मत्ता सपुत्रा मदविह्वला |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
सा पुत्रान्रुदतः सर्वान्मुहुर्मुहुरवेक्षती |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
सा पुरस्ताच्च पश्चाच्च गृहीता भारती चमूः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सा पुराभिमुखी राजञ्जगाम महती चमूः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
सा प्रतिष्ठा तदमृतं लोकास्तद्व्रह्म तद्यशः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
प्रातिकाम्यु उवाच
सा प्रपद्य त्वं धृतराष्ट्रस्य वेश्म; नय़ामि त्वां कर्मणे याज्ञसेनि ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
सा प्रसादय़ती देवमिदं भूय़ोऽभ्यभाषत |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
सा प्रस्विन्ना सुचार्वङ्गी पद्भ्यां दुःखं निय़च्छती |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
सा प्राद्रवद्यतः शव्दस्तामुवाचाथ लक्ष्मणः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सा प्राप्य मिथिलां रम्यां समृद्धजनसङ्कुलाम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
सा प्रीता तेन तस्य सद्भावेन पात्रमय़मनतिक्रमणीय़श्चेति मत्वा ते कुण्डले अवमुच्यास्मै प्राय़च्छत् ||
११८ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
सा प्रीत्या वहुमानाच्च पतिं पर्यचरत्तदा |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
सा प्रेक्षे मुखमन्यासामवराणां वरा सती ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
सा प्रेत्य कामानादाय़ दातारमुपतिष्ठति ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
सा प्रय़त्नेन महता निर्मिता विश्वकर्मणा |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
सा भर्तुर्वचनं श्रुत्वा राजपुत्री यशस्विनी |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
सा भर्त्रे सर्वमाचष्ट रुचिः सुरुचिरानना |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
सा भवेद्धर्मपरमा सा भवेद्धर्मभागिनी |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सा भार्या या प्रिय़ं व्रूते स पुत्रो यत्र निर्वृतिः |
९२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सा भीमभुजनिर्मुक्ता नागजिह्वेव चञ्चला |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
सा भीमभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसंनिभा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
सा भीरूणां परान्याति शूरस्तामधिगच्छति ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
सा भीष्मे प्रतिकर्तव्यमहं पश्यामि साम्प्रतम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
सा भुजं भीमनिर्ह्रादा भित्त्वा भीमस्य दक्षिणम् |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
सा भूमिर्भरतश्रेष्ठ निहतैस्तैर्महारथैः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
सा भूमौ प्रेक्ष्य भर्तारमुपसृत्योपगूह्य च |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
सा भूय़ एव ध्वजिनी विभक्ता; व्यरोचताग्निप्रभय़ा निशाय़ाम् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सा भ्रात्रा प्रेषिता शीघ्रमगच्छन्नर्तनागृहम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
सा मां सम्वोधय़स्यद्य केवलात्महितैषिणी ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सा मां हिमवतः पृष्ठे सुषुवे मेनकाप्सराः |
६९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
सा मामभ्यहनत्तूर्णमंसदेशे च भारत ||
६ ख