शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
कीर्तितं तत्पुरस्तान्मे यतः संय़ान्ति यान्ति च ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
कीर्तितं पुरुषव्याघ्र सर्वपापविनाशनम् ||
४३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
कीर्तितं यत्पुरस्तात्ते तत्सूते चात्ति च प्रजाः ||
७१ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिता द्रौपदी वाचा अनुज्ञाता च पाण्डवैः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
कीर्तितानि नरश्रेष्ठ तीर्थान्याय़तनानि च ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
कीर्तितान्कीर्तय़िष्यामि सर्वपापप्रमोचनान् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
कीर्तितास्ते महाभागाः कालस्य गतिगोचराः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात्समय़े यश्च तिष्ठति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
कीर्तिप्रधानो यश्च स्याद्यश्च स्यात्समय़े स्थितः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
कीर्तिमांस्तस्य पुत्रोऽभूत्सोऽपि पञ्चातिगोऽभवत् |
९६ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
कीर्तिमानश्नुते स्वर्गं हीनकीर्तिस्तु नश्यति ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
कीर्तिरक्षणमातिष्ठ कीर्तिर्हि परमं वलम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
कीर्तिरस्तु तवाक्षय़्या जीव वर्षाय़ुतं सुखी |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिर्नश्येद्राघवस्य तत एतदुपेक्षितम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिर्भवति दानेन तथारोग्यमहिंसय़ा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिय़ा तथा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
कीर्तिर्हि पुरुषं लोके सञ्जीवय़ति मातृवत् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्य महाद्युते |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्येति विद्धि तत् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तिश्च ते भारत पुण्यगन्धा; नश्येत लोकेषु चराचरेषु |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
कीर्तिश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव फलं शुभम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
कीर्तिश्च वर्धते शश्वत्त्रिषु लोकेषु पार्थिव ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
कीर्तिसञ्जननं श्रेष्ठं तडागानां निवेशनम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
कीर्त्यते शव्दसञ्ज्ञाभिः कोऽहमेषोऽप्यसाविति ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
कीर्त्यन्ते शुभकर्माणस्तथा यक्षमहोरगाः ||
१९२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
कीर्त्यमानानि तानीह तत्त्वतः संनिवोध मे |
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्त्यमानान्मय़ा वीर सपत्नगणसूदनान् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
कीर्त्यमानान्मय़ा व्रह्मन्वातवेगान्विषोल्वणान् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्त्यमानेषु राज्ञां तु नामस्वथ सहस्रशः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
कीर्त्यर्थमल्पहृल्लेखाः पटवः कृत्स्ननिर्णय़ाः ||
२७ ग
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
कीर्तय़न्गुणमन्नानामघृणी च पुनः पुनः ||
१८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तय़न्तः स्वनामानि तस्य पादौ ववन्दिरे ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तय़न्तस्तदा पार्थं शरवर्षैरवाकिरन् ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कीर्तय़न्ति स्म ते वीरास्तत्र तत्र जनाधिप ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
जनमेजय़ उवाच
कीर्तय़स्वाग्निसंमर्दे कथं ते न विनाशिताः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
कीर्तय़ानो नरो ह्येतान्मुच्यते सर्वकिल्विषैः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्तय़ामास कर्माणि सत्यकीर्तेर्महात्मनः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
कीर्यमाणं शरैस्तीक्ष्णैर्दृष्ट्वा मे व्यथितं मनः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
कीर्यमाणां शितैर्वाणैः शतशोऽथ सहस्रशः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्यमाणाः शरौघैस्तु योधास्ते पार्थचोदितैः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
कीर्यमाणोऽपि वहुभिर्न स्म भीमोऽभ्यकम्पत ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
कुकुराधिप यान्मन्ये शृणु तान्मे विवक्षतः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
कुक्कुटं चाग्निसङ्काशं प्रददौ वरुणः स्वय़म् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
कुक्कुटश्चाग्निना दत्तस्तस्य केतुरलङ्कृतः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कुक्कुटिका शङ्खनिका तथा जर्जरिका नृप ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
कुक्षिणा दश मासांश्च गर्भं सन्धारय़न्ति याः |
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
कुक्षिदेशेऽवधीद्राजन्स हतो न्यपतद्भुवि ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
कुक्षिनाम्नेऽथ प्रददौ दिशां पालाय़ धर्मिणे |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
कुक्षिसन्धारणाद्धात्री जननाज्जननी स्मृता |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
कुक्षिस्थ एव तस्यास्तु स गर्भः सम्प्रलीय़त ||
८ ग