सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
कुट्टीकृतं तथैवान्यत्कमलाभं सहस्रशः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
कुडवं कुडवं सर्वे व्यभजन्त तपस्विनः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
कुणपं स्थापय़ामास नारदस्य वचः स्मरन् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
कुणपादिव च स्त्रीभ्यस्तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
कुणपामेध्यसंय़ुक्तं यद्वदच्छिद्रवन्धनम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
कुणिन्दपुत्रप्रहितोऽपरद्विपः; शुकं ससूताश्वरथं व्यपोथय़त् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
कुणिन्दपुत्रावरजस्तु तोमरै; र्दिवाकरांशुप्रतिमैरय़स्मय़ैः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
कुणिन्दपुत्रो दशभिर्महाय़सैः; कृपं ससूताश्वमपीडय़द्भृशम् |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
कुणिन्दराजावरजादनन्तरः; स्तनान्तरे पत्रिवरैरताडय़त् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
कुणिन्दास्तङ्गणाम्वष्ठाः पैशाचाश्च समन्दराः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कुणीनामिव विल्वानि पङ्गूनामिव धेनवः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
धृतराष्ट्र उवाच
कुणेर्यथा हस्तगतं ह्रिय़ेद्विल्वं वलीय़सा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
कुण्डधारप्रसादेन तपसा योजितः पुरा ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
कुण्डधारेण यत्प्रीत्या भक्ताय़ोपकृतं पुरा ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
कुण्डभेदिं च सङ्क्रुद्धस्त्रिभिस्त्रीनवधीद्वली ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
कुण्डलानां प्रविद्धानां भूषणानां च भारत ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
कुण्डलानि च निष्काश्च सर्वं चाङ्गविभूषणम् |
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
कुण्डलाभ्यां च दिव्याभ्यां विय़ुक्तः सततं घृणी ||
५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
कुण्डलाभ्यां निमाय़ाथ दिव्येन कवचेन च |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डलाभ्यां विमुक्तोऽहं वर्मणा सहजेन च |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डलार्थे महाराज सूर्यः कर्णमुपागमत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डलार्थे व्रुवंस्तात कारणैर्वहुभिस्त्वय़ा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
कुण्डलाहरणं पर्व ततः परमिहोच्यते ||
४७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डली कवची शूरो दिवाकरसमप्रभः ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
कुण्डली कवची शूरो महावाहुर्महावलः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
कुण्डली मुकुटी शङ्खी रक्तचन्दनरूषितः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४३
कुन्त्यु उवाच
कुण्डली वद्धकवचो देवगर्भः श्रिय़ा वृतः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
कुण्डली वद्धनिस्त्रिंशः संनद्धकवचो युवा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
कुण्डले प्रतिगृह्याचिन्तय़त् |
१६० ख
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डले प्रार्थय़ामास कवचं च महाद्युतिः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डले मे प्रय़च्छस्व वर्म चैव शरीरजम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
कुण्डले रुचिरे चास्तां कर्णस्य सहजे शुभे |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
कुण्डले वालसूर्याभे मालां हेममय़ीं शुभाम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
कुण्डलोपचितं काय़ाच्चकर्त पृतनान्तरे ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपस्रजानि च |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपोज्ज्वलानि च |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
कुण्डलोष्णीषिणः सर्वे निष्काङ्गदविभूषिताः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डारिका कोकलिका कण्डरा च शतोदरी |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डाशी विरजाश्चैव दुःशला च शताधिका |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डोदः पर्वतो रम्यो वहुमूलफलोदकः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डोदरः पदातिश्च वसातिश्चाष्टमः स्मृतः |
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
अष्टक उवाच
कुत आगतः कतरस्यां दिशि त्व; मुताहो स्वित्पार्थिवं स्थानमस्ति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
महाभारत कथा
कुत आगम्यते सौते क्व चाय়ं विहृतस्त्वय়ा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
कुत एव तवापीदं भारतस्य च कस्यचित् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
कुत एव परित्यक्तुं सुतां शक्ष्याम्यहं स्वय़म् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
कुत एव महाप्राज्ञौ माद्रीपुत्रौ करिष्यतः ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
कुत एव हि दुर्भिक्षं क्षमातेजोय़ुता हि ते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
कुत एवावरान्राजन्मृषावादपराय़णः ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् |
१९ क