वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
उद्वेपते मे हृदय़ं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
उद्वेष्टन्ति विचेष्टन्ति संवेष्टन्ति च सर्वशः |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
उद्वेष्टन्ते विवेष्टन्ते पतन्ते चोत्पतन्ति च ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
उद्वेष्टन्ते विवेष्टन्ते वेगं कुर्वन्ति दारुणम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
उदय़ं ज्योतिषां शश्वत्सोमादीनां करोति यः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
उदय़ं पर्वतं यद्वच्छोभय़न्वै दिवाकरः ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
उदय़ंस्तान्हि सर्वान्वै क्रोधाद्धन्ति विभावसुः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
उदय़च्छद्गदां तेभ्यो घोरां तां सिंहवन्नदन् |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
उदय़न्तमथादित्यमभ्यगच्छन्महातपाः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
उदय़न्हि यथा सूर्यो नाशय़त्यासुरं तमः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
उदय़प्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वरः ||
२४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
उदय़ाद्र्यग्र्यभवनं यथाभ्युदितभास्करम् ||
२२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
उदय़ास्तमने नित्यं पुर्यां तस्यां दिवाकरः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
उदय़ास्तमने सूर्यं कवन्धैः परिवारितम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
उदय़ास्तमय़ज्ञं हि न शोकः स्प्रष्टुमर्हति ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
उदय़ास्तमय़ज्ञो हि न शोचति न हृष्यति ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
उदय़ास्तमय़े भानुः प्रदक्षिणमवर्तत ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
उदय़ास्तमय़े सन्ध्ये वेदय़ानो महद्भय़म् |
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
उदय़े नित्यशश्चात्र चन्द्रमा रश्मिभिर्वृतः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
उदय़े पाण्डवानां च प्राप्ते काले न संशय़ः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
उन्नतांसाः पृथुग्रीवा विकटाः स्थूलपिण्डिकाः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
उन्नतेषून्नता षट्सु सूक्ष्मा सूक्ष्मेषु सप्तसु |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
उन्नत्यका माहिषका विकल्पा मूषकास्तथा ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
उन्नमन्ति यथासन्तमाश्रित्येह स्वकर्मसु ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
उन्नाटमभितो जिग्ये कुक्षिमन्तं च पर्वतम् |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानमेवाभिसंश्रय़ेत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानवान्प्लववान्भवेत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
उन्मज्जति हि कालस्य ममत्वेनाभिसंवृतः ||
७३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
उन्मज्जेच्च निमज्जेच्च किञ्चित्सत्त्वं नराधिप ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
उन्मत्त इव मे पुत्रो विलपत्येष सञ्जय़ |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
उन्मत्त इव राजा स स्थितस्तूष्णीं विशां पते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमव्रवीत् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
उन्मत्तमकरावर्तौ महाग्राहसमाकुलौ |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
उन्मत्तमिव चापि त्वां प्रहसन्तीह दुःखितम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
उन्मत्तमिव तत्सर्वं वभूव रजनीमुखे ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
उन्मत्तमिव मातङ्गं सिंहेन विनिपातितम् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
उन्मत्तरङ्गप्रतिमं शव्देनापूरय़ज्जगत् ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता |
११० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
उन्मत्तवत्तदा राजन्विसञ्ज्ञा न्यपतन्क्षितौ ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने गतचेतसम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
उन्मत्तवद्भीमसुता विलपन्ती ततस्ततः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
उन्मत्तवेशप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
नारद उवाच
उन्मत्तवेषं विभ्रत्स चङ्क्रमीति यथासुखम् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
उन्मत्ता वधिरा मूका ये चान्ये पापरोगिणः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशुः पुरवासिनः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
उन्मत्ताश्च विचेष्टन्ते नष्टसञ्ज्ञा विचेतसः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
पिङ्गलो उवाच
उन्मत्ताहमनुन्मत्तं कान्तमन्ववसं चिरम् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
उन्मत्ताय़ परां श्रद्धामास्थाय़ स धृतव्रतः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
उन्मत्तेव वरारोहा कथं वुद्ध्वा भविष्यति ||
२० ख