chevron_left  कर्णंarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
कर्णं च त्वां च द्रौणिं च कृपं च सुमहारथम् |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
कर्णं च निर्जितं मत्वा भीमसेनेन भारत ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
कर्णं च पार्थं च निय़म्य वाहा; न्खस्था महीस्थाश्च जनावतस्थुः ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं च पुरुषव्याघ्रं सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनम् ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं च सौवलं चैव भ्रातॄंश्चैवेदमव्रवीत् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
कर्णं चाप्यकरोत्क्रुद्धो रुधिरोत्पीडवाहिनम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
कर्णं चाप्यजय़द्दृष्ट्या कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः ||
७२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं चैव महात्मानं कौन्तेय़ं सत्यसङ्गरम् ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां; शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां; शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
कर्णं तु सर्वभूतानि पूजय़ामासुरञ्जसा |
९३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णं त्वस्यन्तमस्त्राणि दिव्यानि च वहूनि च |
६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं दुःशासनं चैव शकुनिं चाव्रवीदिदम् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं दुर्योधनं चैव द्रोणपुत्रं च षड्रथान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कर्णं दृष्ट्वा महेष्वासं युद्धाय़ समवस्थितम् |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
कर्णं द्रक्ष्यति कुन्ती च सौभद्रं चापि यादवी |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
कर्णं द्वादशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिः शरैः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
कर्णं द्वादशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिस्तथा |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
कर्णं न चेदद्य निहन्मि राज; न्सवान्धवं युध्यमानं प्रसह्य |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
कर्णं निहतमेवाजौ विद्धि सद्यो धनञ्जय़ ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं परिष्वज्य मुदा ततो वचनमव्रवीत् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
कर्णं पश्य महारङ्गे ज्वलन्तमिव पावकम् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
कर्णं पुरस्कृत्य विदुर्हि सर्वे; त्वदस्त्रमस्त्रैर्विनिपात्यमानम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
कर्णं प्रति महेष्वासं द्वैरथे सव्यसाचिना ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
कर्णं प्रहर्षय़न्तश्च शङ्खान्दध्मुश्च पुष्कलान् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
कर्णं प्राच्छादय़द्वाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णं प्राप्य रणे सूत मम पुत्रः सुय़ोधनः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम् ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
कर्णं महावाहुमदीनसत्त्वं; सुषेणमाता रुदती भृशार्ता ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
कर्णं रथवरश्रेष्ठं श्रेष्ठं सर्वधनुष्मताम् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
कर्णं ववर्षुर्वाणौघैर्यथा मेघा महीधरम् ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
कर्णं वा जघ्नतुः कृष्णौ कर्णो वापि जघान तौ ||
१०४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णं विनिहतं दृष्ट्वा हार्दिक्यः किमभाषत ||
९४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
कर्णं विनेदुः सहिताः पृषत्कैः; संमर्दमानाः सह पार्षतेन ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
कर्णं विव्याध विंशत्या तदद्भुतमिवाभवत् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
कर्णं विव्याध विंशत्या सारथिं च त्रिभिः शरैः ||
५९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
कर्णं विव्याध सप्तत्या शरैः संनतपर्वभिः ||
१० ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
कर्णं विव्याध समरे नवत्या निशितैः शरैः ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं वैकर्तनं चैव सहपुत्रममर्षणम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं वैकर्तनं धीमान्विकृष्य वलवद्धनुः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं संशप्तकांश्चैव पार्थस्यामित्रघातिनः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं सेनापतिं कृत्वा कृतकौतुकमङ्गलाः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
कर्णं सेनापतिं कृत्वा प्रमथिष्यामहे रिपून् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णं स्मरेथाः सततं सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
कर्णं हि कुरवोऽस्मार्षुः स हि देवव्रतोपमः ||
३० ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
कर्णः पार्थान्रणे सर्वान्विजेष्यति न संशय़ः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
कर्णः पार्थान्सगोविन्दाञ्जेतुमुत्सहते रणे |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
कर्णः प्रत्युद्ययौ योद्धुं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
कर्णः प्रसादय़ंश्चैनमिदमित्यव्रवीद्वचः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः कृपं वाक्यमथाव्रवीत् ||
२४ ख