आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
ख एव समशुष्यन्त न काश्चित्पावकं गताः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
खं च भूमिं च सम्वद्धां मेनिरे क्षत्रिय़र्षभाः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
खं तमोवृतमासीच्च नासीद्भानुमतः प्रभा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
खं दिशः प्रदिशश्चैव भासय़ामासुरोजसा |
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
खं पूरय़न्महावेगान्खगमान्खगवाससः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
खं मर्त्या इव वाहुभ्यां नानुगन्तुमशक्नुवन् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
खं वाय़ुमग्निं सलिलं तथोर्वीं; समन्ततोऽभ्याविशते शरीरी |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
खगपत्रैः शरैस्तीक्ष्णैरभ्यवर्षद्गतव्यथः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
खगेश्वरं शरणमुपस्थिता वय़ं; महौजसं वितिमिरमभ्रगोचरम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
खगो महदिदं भूतमिति मत्वाभ्यभाषत ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
खगोत्तमो द्रुतमभिपत्य वेगवा; न्वभञ्ज तामविरलपत्रसंवृताम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
खचरनगरकल्पं कल्पितं शास्त्रदृष्ट्या; चलदनिलपताकं ह्रादिनं वल्गिताश्वम् |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
खजं च दर्वीं च करेण धारय़; न्नसिं च कालाङ्गमकोशमव्रणम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
खटाखटेति वाशन्तो भैरवं भय़वेदिनः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
खट्वाङ्गधारिणं मुण्डं जटिलं व्रह्मचारिणम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
खट्वाङ्गनाभागदिलीपकल्पो; यय़ातिमान्धातृसमप्रभावः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
खड्गं गृहीत्वा हेमचित्रं समिद्धं; धनुश्चेदं गाण्डिवं तालमात्रम् |
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
खड्गं च भल्लैर्निचकर्त मुष्टौ; नदन्प्रहृष्टस्तव सैन्यमध्ये ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
खड्गं च विपुलं दिव्यं जातरूपपरिष्कृतम् |
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
खड्गं च विपुलं दिव्यं प्रगृह्य सुभुजो वली ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
खड्गं चर्म च सम्वाधे धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ||
१४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
खड्गं चान्यतरं प्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जय़ाय़ वा ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जय़स्य वा |
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
खड्गकार्मुकनिर्यूहैः शरैश्च विविधैरपि |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
खड्गचर्मधरः श्रीमानुत्पपात विहाय़सम् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
खड्गपाणिरदीनात्मा अतिष्ठद्भुवि दंशितः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
खड्गप्रहरणे युक्ताः सम्पाते चासिचर्मणोः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
खड्गमत्स्यं गदाग्राहं शूराय़ुधमहास्वनम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
खड्गमादत्त विपुलं शतचन्द्रं च भानुमत् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
खड्गमादाय़ चिच्छित्सुः शिरस्तस्य महात्मनः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
खड्गमादाय़ चिच्छेद भुजौ तस्य पतत्रिणः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
खड्गमादाय़ दुष्टात्मा जवेनाभिपपात ह ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
खड्गमादाय़ निशितं विमलं च शरावरम् |
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
खड्गमुद्यम्य वेगेन द्रौणिरभ्यपतद्द्रुतम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
खड्गशक्तिधनुःकीर्णां गजाश्वरथसङ्कुलाम् |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
खड्गशक्तिधरैर्वीरैर्गदामुसलपाणिभिः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
खड्गांश्च पीतान्दीर्घांश्च कलापांश्च महाधनान् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
खड्गी रथादवप्लुत्य सहसा द्रोणमभ्ययात् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
खड्गेन चरतस्तस्य शोणाश्वानधितिष्ठतः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
खड्गेन चाहं निशितेन सङ्ख्ये; काय़ाच्छिरस्तस्य वलात्प्रमथ्य |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
खड्गेन निशितेनाजौ प्रमथिष्यामि गौतम ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
खड्गेन पृथुना मध्ये भानुमन्तमथाच्छिनत् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
खड्गेन भृशतीक्ष्णेन निकृत्तस्तिलकाण्डवत् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
खड्गेन शक्यते युद्धे साध्वात्मा परिरक्षितुम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
खड्गेन शितधारेण द्विधा चिच्छेद कौरवः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
खड्गेन शितधारेण संय़ुगे गजय़ोधिनाम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
खड्गेनान्यांश्च चिच्छेद नादेनान्यांश्च भीषय़न् ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
खड्गैश्च निशितैः पीतैर्निर्मुक्तैर्भुजगैरिव ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
खड्गैश्च विमलैस्तीक्ष्णैः सशरैश्च शरासनैः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
खण्डखण्डा च राजेन्द्र पूषणा मणिकुण्डला |
२० क