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आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
गगनस्थं विनिःश्वस्य दिवाकरमुदैक्षत ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भरद्वाज उवाच
गगनस्य दिशां चैव भूतलस्यानिलस्य च |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
गगनात्पुष्पवर्षं च पश्यस्व पतितं भुवि ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
गगनात्प्रच्युताः सिद्धाः पुण्यानामिव सङ्क्षय़े ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
गगनाद्गां गता देवी गङ्गा सर्वसरिद्वरा ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गगनाद्यां महापुण्यां पतन्तीं वै महेश्वरः |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
गगने रचिता माला काञ्चनीव व्यराजत ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गा कमण्डलुं दिव्यममृतोद्भवमुत्तमम् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा प्रतिपद्यते ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
गङ्गा च यमुना चैव पर्वतश्च दधातु ते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
गङ्गा च यमुना चैव सरितश्चानुगास्तय़ोः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
गङ्गा च शतकुम्भा च शरय़ूर्गण्डसाह्वय़ा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
गङ्गा च सरितां श्रेष्ठा सर्वतीर्थजलोद्भवा |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गा तारय़ते नॄणामुभौ वंशौ विशेषतः ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
गङ्गा भवति गन्धर्व यथा द्वैपाय़नोऽव्रवीत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गा भागीरथी तस्मादुर्वशी ह्यभवत्पुरा ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
गङ्गा महानदी चैव कपिला नर्मदा तथा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गा यत्र नदी पुण्या यस्यास्तीरे भगीरथः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गा विगाह्या सततमेतत्कार्यतमं सताम् ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
गङ्गा सरस्वती पुण्या भ्रुवावास्तां महानदी ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गां गत्वा यैः शरीरं विसृष्टं; गता धीरास्ते विवुधैः समत्वम् ||
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गां गोकुलसम्वाधां दृष्ट्वा स्वर्गोऽपि विस्मृतः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गां त्रिपथगां दृष्ट्वा तथा दृष्टिः प्रसीदति ||
७६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम् |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गां प्रजग्मुरभितो वाससैकेन संवृताः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गां योऽनुगतो भक्त्या स तस्याः प्रिय़तां व्रजेत् ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
गङ्गां विक्षोभय़िष्यन्ति पार्थानां युधि वाहिनीम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् |
९३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
गङ्गाकूले मय़ा दृष्टस्तापसैः परिवारितः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गाकृतानचिरेणैव लोका; न्यथेष्टमिष्टान्विचरिष्यसि त्वम् ||
९९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
गङ्गाजलात्समुत्तस्थौ सहस्रं विपुलौजसाम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गातीरे पृथाशृण्वदुपाध्ययननिस्वनम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गङ्गादर्शनजा प्रीतिर्व्यसनान्यपकर्षति ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गाद्याः सरितश्चैव प्लक्षादींश्च वनस्पतीन् |
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गाद्वारं कुरुश्रेष्ठो यत्र दग्धोऽभवन्नृपः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
गङ्गाद्वारं प्रति महान्वभूवर्षिर्महातपाः |
१ क
वन पर्व
अध्याय ९५
लोमश उवाच
गङ्गाद्वारमथागम्य भगवानृषिसत्तमः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
गङ्गाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नेमिपर्वते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८०
नारद उवाच
गङ्गाद्वारे महातेजा देवगन्धर्वसेविते ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गामनु महात्मानस्तूर्णमश्वानचोदय़न् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गामनुचचारैकः सिद्धचारणसेविताम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
भीष्म उवाच
गङ्गामभ्येहि सततं प्राप्स्यसे सिद्धिमुत्तमाम् ||
१०३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
भीष्म उवाच
गङ्गामुपास्य विधिवत्सिद्धिं प्राप्तः सुदुर्लभाम् ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
गङ्गावतरणे यत्नं सुमहच्चाकरोन्नृपः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
गङ्गावेग इवानूपांस्तीरजान्विविधान्द्रुमान् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
गङ्गासङ्गमय़ोश्चैव स्नाति यः सङ्गमे नरः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
गङ्गासरय़्वोर्वेगेन प्रावृषीवोल्वणोदके ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
गङ्गाह्रद उपस्पृश्य तथा चैवोत्पलावने |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ |
१५३ क