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विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
गता ह्यस्मानपाकीर्य सर्वे द्वैतवनादिति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
गतां रैवतके कन्यां विदित्वा जनमेजय़ ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
गताः परमकं स्थानं देवैरपि सुदुर्लभम् ||
५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
गताः प्रत्यक्षधर्माणस्ते सर्वे वनमाश्रिताः |
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
गताः शरीरैर्वसुधामूर्जितैः कर्मभिर्दिवम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
गताः स्वभवनं देवा ऋषय़श्च तपोधनाः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
गतागतप्रतिगता वह्वीश्च निकुडीनिकाः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
गतागते सुवहुशो ज्ञानविज्ञानपारगम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
गतानृण्यो भवेद्राजा यथा शास्त्रेषु दर्शितम् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
गतानृषींस्तथा देवानसुरांश्च तथा गतान् |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
गतान्सर्वात्मना भक्त्या धार्तराष्ट्रान्सराजकान् |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
गतापराह्णभूय़िष्ठे तस्मिन्नहनि भारत |
१ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
गतासवस्तथा चान्ये प्रगृहीतशरासनाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
गतासु तासु सर्वासु त्रिजटा नाम राक्षसी |
५३ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
गतासुं ददृशुर्भूमौ रुधिरेण समुक्षितम् ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
गतासुं पतितं भूमौ राक्षसाः प्राद्रवन्भय़ात् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १३८
लोमश उवाच
गतासुं पुत्रमादाय़ विललाप सुदुःखितः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
गतासुकल्पा निश्चेष्टा वभूवुः सहलक्ष्मणाः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
गतासुभिरमित्रघ्न विवभौ संवृता मही ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
गतासुभिरमित्रघ्न संवृता रणभूमय़ः ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
गतासुमपि राधेय़ं नैव लक्ष्मीर्व्यमुञ्चत ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
गतासुरपतद्भूमौ कवन्धः सुमहांस्ततः ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
गतासुराजौ निपपात भूमौ; नगो नगाग्रादिव वातरुग्णः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
गतासू पेततुर्वीरौ सोदर्यावेकलक्षणौ ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
गतासूनपि वः शुष्कान्भूमिः सन्धारय़िष्यति |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
गतासूनमृतेनेव जीवय़न्तीदमव्रवीत् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
गतासूनां च कौन्तेय़ देहान्दृष्ट्वा तथाशुभान् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
गतास्तु दक्षिणामाशां ये वै वानरपुङ्गवाः |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूतां गतिं शुभाम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूताः परां गतिम् ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
गतास्ते व्रह्मसदनं हता वीराः सुवर्चसः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ८
शकुनिरु उवाच
गतास्ते समय़ं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
दाल्भ्य उवाच
गताहारमकृत्वा च तथा जीवति सत्यवान् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २००
वैशम्पाय़न उवाच
गताय़ामथ कृष्णाय़ां युधिष्ठिरपुरोगमान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
गताय़ामथ तस्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
गताय़ाश्चोत्तरं पार्श्वमुत्तरं निःसृतं मुखम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९
देवदूत उवाच
गताय़ुरेषा कृपणा गन्धर्वाप्सरसोः सुता |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
गताय़ुषमसामर्थ्यं क्षीणसारं हतश्रिय़म् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
गतिं गच्छन्ति सन्तुष्टास्तामाहुः परमां गतिम् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
गतिं च मुखवर्णं च दृष्ट्वा रामो हनूमतः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
गतिं च यां दर्शनमाह देवो; गत्वा शुभं दर्शनमेव चाह |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
गतिं चापि न पश्यामि तस्मान्मोक्षाय़ रक्षसः ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
गतिं चाप्यशुभां ज्ञात्वा नृपते पापकर्मणाम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गङ्गां संसेव्य यां लभेत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
गतिं परमिकां प्राप्तमजानन्तो नृय़ोनय़ः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
गतिं प्राप्स्यन्ति कौन्तेय़ यथास्वमरिकर्शन ||
२१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
गतिं यस्य न यास्यन्ति मानुषा लोकवासिनः ||
६५ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
गतिं वा परमां तस्य नोत्सहे वक्तुमन्यथा ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
गतिं विशिष्टां गच्छन्ति प्राणदा इति नः श्रुतम् ||
१० ख