chevron_left  गतिंarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
गतिं स्वगत्यानुचकार मन्दो; निर्गच्छतां पाण्डवानां सभाय़ाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
गतिं हि सर्वभूतानामगत्वा क्व गमिष्यसि |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
गतिः पतिः समस्थाय़ा विषमे तु पिता गतिः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
गतिः परमसिद्धानां देवर्षीणां प्रकाशते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
गतिः पुनर्वर्णकृता प्रजानां; वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
गतिः स्थानं च लोकाश्च जापकेन यथा जिताः ||
११७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
गतिज्ञः सर्वभूतानां तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
गतिज्ञः सर्वभूतानां रुतज्ञश्च शरीरिणाम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
गतिज्ञाः सर्वभूतानामध्यात्मगतिचिन्तकाः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
गतिमग्नेरिव प्रेक्ष्य स्मर्तासि वचनस्य मे ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
गतिमन्तश्च तेनेष्ट्वा नान्ये नित्या भवन्ति ते ||
१२ ग
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
गतिमन्तो भवन्त्वद्य सर्वे विषय़वासिनः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
सौदास उवाच
गतिमन्यां न पश्यामि मदय़न्तीसहाय़वान् |
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गतिमन्वेषमाणानां न गङ्गासदृशी गतिः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
गतिमागमनं वेत्ति स्थानं वेत्ति ततः प्रभुः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एव सतां गतिः |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
गतिरेषा द्विजश्रेष्ठ कर्मणात्मावसादिनः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
गतिर्भव त्वं देवानां सेन्द्राणाममरोत्तम |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
देवा ऊचुः
गतिर्भव सुरश्रेष्ठ त्राहि नो महतो भय़ात् ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
गतिर्भूत्वा महाराज ज्ञातीनां सुहृदां तथा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न दृश्यते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २
व्राह्मणा ऊचुः
गतिर्या भवतां राजंस्तां वय़ं गन्तुमुद्यताः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
शल्य उवाच
गतिश्च नस्त्वं देवेश पूर्वजो जगतः प्रभुः |
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
अर्जुन उवाच
गतिश्च परमा कृष्ण तेन ते वाक्यमद्भुतम् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
गतीः सहस्राणि च पञ्च तस्य; चत्वारि संवर्तकृतानि चैव |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
युधिष्ठिर उवाच
गतीनामुत्तमा प्राप्तिः कथिता जापकेष्विह |
१ क
वन पर्व
अध्याय २९०
वैशम्पाय़न उवाच
गते तस्मिन्द्विजश्रेष्ठे कस्मिंश्चित्कालपर्यये |
१ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
गते तस्मिन्हरिवरे भीमोऽपि वलिनां वरः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
गते तस्यापि शतधा मूर्धागच्छदरिन्दम ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
गते तु काम्यकात्तात पाण्डवे सव्यसाचिनि |
४ क
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
गते तु तस्मिन्वरदेववाहे; शक्रात्मजः सर्वरिपुप्रमाथी |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
गते तु नारदे पार्थो भ्रातृभिः सह कौरव |
७३ क
वन पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान्प्रति |
१ क
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
गते त्रय़ोदशे वर्षे सत्येनाय़ुधमालभे |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
गते दुर्योधने कृष्णः किरीटिनमथाव्रवीत् |
३१ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
गते देवव्रते स्वर्गं देवकल्पे नरर्षभे ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
गते द्वारवतीं कृष्णे वलदेवे च माधवे |
१ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
गते द्वारवतीं कृष्णे सात्वतप्रवरे नृप |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय ११३
नारद उवाच
गते पतगराजे तु गालवः सह कन्यया |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २७९
मार्कण्डेय़ उवाच
गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ९
जनमेजय़ उवाच
गते भगवति व्यासे धृतराष्ट्रो महीपतिः |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
गते भगवति व्यासे राजा पाण्डुसुतस्ततः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
गते भीष्मे महाराज धार्तराष्ट्रो जनाधिपः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
गते मुनिवरे तस्मिन्कृते चापि प्रदक्षिणे |
९२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
गते रामे तीर्थय़ात्रां भीष्मकस्य सुते तथा |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
गते वज्रधरे राजंस्तत्र वर्षं पपात ह |
५३ क