chevron_left  अपातय़द्ध्वजमस्यarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अपातय़द्ध्वजमस्य प्रमथ्य; छिन्नध्वजः सोऽप्यपय़ाज्जवेन ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अपातय़द्ध्वजांश्चैव रथिनश्च शितैः शरैः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
अपातय़द्रणे राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अपातय़द्वलदेवद्वितीय़ो; हत्वा ददौ चोग्रसेनाय़ राज्यम् ||
७२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अपातय़न्त पुत्रांस्ते रथेभ्यः सुमहारथान् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
अपातय़न्त भल्लाग्रैः शिरः काय़ान्नराधिप |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
अपातय़न्पार्थमूर्ध्नि जय़गृद्धाः प्रमन्यवः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
अपान न त्वं श्रेष्ठोऽसि प्राणो हि वशगस्तव ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
अपानं गिरति प्राणः प्राणं गिरति चन्द्रमाः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
अपानः प्रचचाराथ व्यानस्तं पुनरव्रवीत् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
अपानप्राणय़ोर्मध्ये उदानो व्याप्य तिष्ठति |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
अपानप्राणय़ोर्मध्ये प्राणापानसमाहितः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
अपानश्च ततो ज्ञेय़ः प्राणश्चापि ततः परम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
अपानाक्षः प्राणय़ुगः प्रज्ञाय़ुर्जीववन्धनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
अपानुदद्भय़ं पार्थाद्युद्धाय़ च मनो दधे ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण उवाच
अपाने सम्भृतो वाय़ुस्ततो व्यानः प्रवर्तते ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
अपानोदानय़ोर्मध्ये प्राणव्यानौ समाहितौ |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
व्यास उवाच
अपान्तरतमा नाम ततो जातोऽऽज्ञय़ा हरेः |
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
अपान्तरतमा नाम सुतो वाक्सम्भवो विभोः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
अपापः कौरवेय़ेषु कथं वन्धनमर्हति ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान्नलम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
अपापमशठं वृत्तमजिह्मं नित्यमाचरेत् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
अपापवादी भवति यदा भवति धर्मवित् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
वाय़ुरु उवाच
अपापा मैथिली राजन्सङ्गच्छ सह भार्यया ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
अपापां तामहं वालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ||
३७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
अपापाः पाण्डवा येन निकृताः पापवुद्धिना |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
कामन्द उवाच
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं वहुमतो भवेत् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३२
भीष्म उवाच
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं वहुमतो भवेत् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
अपामग्नेस्तथेन्दोश्च स्पर्शं वेदय़ते यथा |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२५
व्यास उवाच
अपामपि गुणांस्तात ज्योतिराददते यदा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
अपामिव महावेगस्त्रस्ता मृगगणा इव |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
अपामिव महावेगस्त्रस्ता मृगगणा इव ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
अपामेते गुणा व्रह्मन्कीर्तितास्तव सुव्रत ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
अपाम्पतिरथोवाच ममाप्यंशो भवेत्ततः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
अपाम्पतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नैषधः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
अपारणीय़ं तमसः परस्ता; त्तदन्तकोऽप्येति विनाशकाले |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
अपारणीय़े दुश्चिन्त्ये यथाभूतं प्रचक्ष्व मे ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अपारपरिमेय़ाय़ तस्मै चिन्त्यात्मने नमः ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
अपारमप्लवागाधं समुद्रं शरवेगिनम् |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
अपारमिव गर्जन्तं सागरप्रतिमं महत् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
अपारमिव सन्दृश्य सागरप्रतिमं वलम् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
अपारवीर्यौ सम्प्रेक्ष्य प्रगृहीतगदावुभौ |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
अपाराणामिव द्वीपमगाधे गाधमिच्छताम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
अपारे पारकामा ये त्यजेय़ं तानहं कथम् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अपारे पारमिच्छन्तो हते शूरे महात्मनि ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अपारे भव नः पारमप्लवे भव नः प्लवः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
युधिष्ठिर उवाच
अपारे मार्गमाणस्य परं तीरमपश्यतः ||
१६ ख