वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
गत्वा मधुवटीं चापि देव्यास्तीर्थं नरः शुचिः |
७९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
गत्वा मम वचो व्रूहि वासुदेवस्य शृण्वतः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
गत्वा यथोक्तं तत्सर्वमुवाच कुरुसंसदि ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
गत्वा योधय़ मा भैस्त्वं त्वं ह्यस्य जगतः पतिः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा राजकुलाय़ैव द्रौपदीमिदमव्रवीत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
गत्वा वीरप्रमोक्षं च सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा वृष्ण्यन्धककुलं धनुर्वेदं ग्रहीष्यति |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा व्रूहि महावाहो सर्वशस्त्रभृतां वरम् |
७९ क
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
गत्वा सुदेव नगरीमय़ोध्यावासिनं नृपम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
गत्वा सुमहदध्वानमादित्यस्य प्रभां ततः |
३९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा स्नात्वा च विधिवद्व्राह्मणेभ्यो धनं ददौ ||
२३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
गत्वा स्वदेशं द्रक्ष्यामि स्थूलशङ्खाः शुभाः स्त्रिय़ः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
गत्वा हि श्रद्धय़ा युक्तः कुरुक्षेत्रं कुरूद्वह |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
गत्वात्मानं विमुञ्चामि किं फलं जीवितेन मे ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
गत्वानवाप्य तत्सर्वं नदीवेगसमाप्लुतम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वान्तरिक्षात्सततं क्षीरोदममृताशय़म् |
१२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
गत्वाव्रुवन्नहुषं शक्र तत्र; त्वं नो राजा भव भुवनस्य गोप्ता |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वाश्रमं व्राह्मणेभ्य आचख्यौ सर्वमेव तत् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
गत्वाश्रमपदाद्दूरमुटजं कृतवांस्तु सः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
गत्वाश्रममसम्वुद्धं जमदग्नेर्महात्मनः ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
गत्वाहं जामदग्न्यं तं प्रय़ाचिष्ये कुरूद्वह |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
गत्वाहं तत्कुरुक्षेत्रं स च रामः प्रतापवान् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
गत्वाहं वरय़िष्ये तां मनो हि मम तद्गतम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वैकत्वं च कृष्णेन पार्थाभ्यां चैव सत्कृतः |
४२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
गत्वैतांस्तु महाराज समेत्य त्वं महारथान् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वोत्तराय़णं तेजोरसानुद्धृत्य रश्मिभिः |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
गदं वीक्ष्य शय़ानं च भृशं कोपसमन्वितः |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
गदतः शृणु मे राजन्यथावदिह भारत ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
गदतस्तं ममाद्येह पन्थानं दुर्विदं परम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
गदतस्तन्ममाद्येह शृणु सत्यपराक्रम |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
गदप्रद्युम्नसाम्वांश्च कालवज्रानलोपमान् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
गदप्रद्युम्नसाम्वाश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
गदा क्षिप्ता तु समरे मद्रराजेन भारत |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
गदा हेमाङ्गदा राजंस्तूर्णं हैडिम्वसूनुना |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
गदां कौमोदकीं दिव्यां शक्तिं चक्रं धनुः शरान् |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
कृप उवाच
गदां गदाप्रिय़स्येमां समीपे पतितां भुवि ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
गदां गुर्वीं समुद्यम्य त्वरितश्च वृकोदरः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
गदां गृहीत्वा समरे भीमसेनाय़ चाक्षिपत् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
गदां च पश्य गान्धारे हेमपट्टविभूषिताम् ||
२७ ग
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
गदां च भीमसेनाय़ प्रवरां प्रददौ तदा |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
गदां च मद्राधिपवाहुमुक्तां; द्वाभ्यां शराभ्यां निचकर्त वीरः ||
१०९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
गदां च सहदेवेन शरौघैः समवारय़त् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
गदां चिक्षेप वेगेन वज्रपातोपमां तदा ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
गदां चिक्षेप सङ्क्रुद्धस्तव पुत्रस्य मारिष ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
गदां चिक्षेप सङ्क्रुद्धो भारद्वाजरथं प्रति ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
गदां चिक्षेप सहसा धर्मपुत्राय़ मारिष ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
गदां जग्राह कौरव्यो गदाय़ुद्धविशारदः ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
गदां जग्राह महतीं भारद्वाजाय़ चाक्षिपत् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
गदां परामृशद्धीमान्धार्तराष्ट्रो महावलः ||
३७ ख