द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
विमुच्य सशरं चापं भूरिव्रणपरिस्रवः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशय़ः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
विमुच्य हृदय़ग्रन्थींश्चङ्कम्यन्ते यथासुखम् ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
विमुच्य हृदय़ग्रन्थीनासादय़ति तां गतिम् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
विमुच्यते कलिकलुषेण मानवः; प्रिय़ं सुतान्पशुधनमाप्नुय़ात्तथा ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
विमुच्यते चापि स सर्वसङ्करै; र्न चास्य दोषैरभिभूय़ते मनः |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
विमुच्यमानः पापेभ्यो धनेभ्य इव चन्द्रमाः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
विमुच्यास्य भुजौ पीनाविदं वचनमव्रवीत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चञ्शरवर्षाणि पर्जन्य इव वृष्टिमान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
विमुञ्चति स्वकं गन्धं माल्यगन्धेऽवतिष्ठति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
विमुञ्चत्याकृतिग्रामांस्तान्मुक्त्वामृतमश्नुते ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चन्तं च संरम्भाद्ददृशुस्ते महारथम् ||
७५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चन्तं महास्त्राणि पातय़िष्यामि तं रथात् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
विमुञ्चन्तं शरान्घोरान्दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे |
७४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
विमुञ्चन्तः शितान्वाणाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
विमुञ्चन्तः सुसंरव्धाः शरवर्षाणि भारत ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
विमुञ्चन्तु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चन्तौ शरांस्तीक्ष्णान्सन्दधानौ च साय़कान् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चन्निशितान्वाणाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चन्वा शराञ्शीघ्रं दृश्यते स्म हि कैरपि ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
विमुञ्चन्विशिखांस्तीक्ष्णानाचार्यं छादय़न्भृशम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
विमुञ्चाम्येष वाणांस्ते पुत्र युद्धे स्थिरो भव |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
विमुह्यमानो राधेय़ो यत्नात्तमनुधावति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
विमूढसञ्ज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भ्रान्तैरिव सारथिः ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
विमूढा हि वय़ं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
विमूढास्मि कृतानेन तथास्वास्थ्यं कृतं परम् |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
विमूत्रान्भग्नसंविग्नांस्तथा विशकृतोऽपरान् ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां कृष्णं वचनमव्रवीत् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां शोकजं वाष्पमुत्सृजन् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
विमृद्नतस्तस्य तु पाण्डुसेना; मस्तं जगामाथ सहस्ररश्मिः |
७८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
विमृद्नन्पाण्डववलं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
विमृद्य तरुशृङ्गाणि संनिवृत्तमिवानिलम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
विमृद्य सूतपुत्रस्य सेनां भारत साय़कैः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
विमृद्यैवं महानागान्ममर्दाश्वान्नरर्षभः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
विमृश त्वं शनैस्तात को न्वत्र वलवानिति ||
१७ ख
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
विमृशन्नेव कालं तं परिचिन्त्य जनार्दनः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
विमृशेदात्मसंस्थानामेकैकमनुसन्ततम् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
विमृश्य कस्य कः पक्षः पार्थिवा वदतोत्तरम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
व्यास उवाच
विमृश्य च मुनिश्रेष्ठो देवदूतमुवाच ह ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
विमृश्य चिरकारित्वाच्चिन्तय़ामास वै चिरम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
विमृश्य तस्मात्प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
विमृश्य तेन कालेन पत्न्याः संस्थाव्यतिक्रमम् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
विमृश्य प्रज्ञय़ा धीर जहीमं ह्यस्थिरं द्रुमम् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
विमृश्य सम्यक्च धिय़ा कुर्वन्प्राज्ञो न सीदति ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
विमृश्यावहितो राजा निश्चित्य च पुनः पुनः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
राजो उवाच
विमृश्याहं प्रदास्यामि वरय़ त्वं यथेप्सितम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
विमोक्षप्रभविष्णुत्वमुपपन्नमसंशय़म् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
विमोक्षादानसन्धाने लघुत्वं परमाप सः ||
१४ ख