शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
गदाभुशुण्डिहस्ताश्च तथा तोमरपाणय़ः |
१०५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
गदाभृतां नाद्य समोऽस्ति भीमा; द्धस्त्यारोहो नास्ति समश्च तस्य |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
गदाभ्यां सहसान्योन्यमाजघ्नतुररिन्दमौ ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
गदामण्डलतत्त्वज्ञश्चचारामितविक्रमः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
गदामलघुवेगां तां विस्मितः सम्वभूव ह ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
गदामस्य परामृश्य तमेवाजघ्निवान्वली |
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
गदामादाय़ कौन्तेय़मभिदुद्राव वेगवान् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
गदामादाय़ तरसा परिप्लुत्य महावलः |
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
गदामादाय़ ते पुत्रः पाञ्चाल्यावभ्यधावत ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
गदामादाय़ तेजस्वी पदातिः प्रस्थितो ह्रदम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
गदामादाय़ वेगेन पदातिः प्रस्थितो रणम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
गदामारुतवेगं हि दृष्ट्वा तस्य महात्मनः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
गदामारुतवेगेन तव पुत्रस्य भारत |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
गदामाश्रित्य धीरात्मा प्रत्यमित्रमवैक्षत ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
गदामुद्यच्छमानस्य कालस्येव महामृधे |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
गदामुद्यम्य यो याति किमन्यद्भागधेय़तः ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
गदामुद्यम्य वेगेन हृदि द्रौणिमताडय़त् ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
गदामुसलनाराचशक्तितोमरहस्तय़ा |
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
गदामुसलरुग्णानां भिन्नानां च वरासिभिः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
गदामुसलशक्त्याद्यैर्वृतः प्रहरणोत्तमैः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
गदामेवाग्रहीत्क्रुद्धश्चिक्षेप च परन्तपः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
गदाविद्युन्महारौद्रः सङ्ग्रामजलदो महान् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
गदाविमथितैर्गात्रैर्मुसलैर्भिन्नमस्तकाः |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
गदाविमथितैर्गात्रैर्मुसलैर्भिन्नमस्तकान् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
गदाविमुक्तौ तौ भूय़ः समासाद्येतरेतरम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
गदावेगेन महता व्याय़ामेन च मोहितः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
गदाशक्त्यसिवृष्टीस्ता निहत्य स महास्त्रवित् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
गदाश्च गुर्वीः परिघानय़स्मय़ा; नसींश्च शक्तीश्च रणे नराधिपाः |
८८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
गदाश्च विमलैः पट्टैः पिनद्धाः स्वर्णभूषिताः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
गदाश्च शैक्याः परिघाश्च शुभ्रा; रथेषु शक्त्यश्च विवर्तमानाः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
गदासम्पातजास्तत्र प्रजज्ञुः पावकार्चिषः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
गदासिखड्गैश्च परश्वधैश्च; प्रासैश्च तीक्ष्णाग्रसुपीतधारैः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
गदासिचर्मग्रहणेषु शूरा; नस्त्रेषु शिक्षासु रथाश्वय़ाने |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
गदासिमकरावर्तं हय़ग्राहं गजाकुलम् ||
२६ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
गदाहस्तं तु तं दृष्ट्वा सशृङ्गमिव पर्वतम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
गदाहस्तं भीममभिद्रवन्तं; माद्रीपुत्रौ सम्पतन्तौ दिशश्च |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
गदाहस्तः पाण्डवस्तद्वदेव; हन्ता मदीय़ान्सहितोऽर्जुनेन ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
गदाहस्तो भीमसेनोऽप्रमत्तो; दुर्योधनं स्मारय़ित्वा हि काले ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
गदाहस्तो महावाहुरपतत्स्यन्दनोत्तमात् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
गदाहस्तौ ततस्तौ तु मण्डलावस्थितौ वली ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
गदाय़ां शस्त्रकुशलो दर्शनानि व्यदर्शय़त् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
गदाय़ुद्धं तु तुमुलमत्रैव परिकीर्तितम् |
१७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
गदाय़ुद्धविशेषज्ञा निय़ुद्धकुशलास्तथा |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
धृतराष्ट्र उवाच
गदाय़ुद्धविशेषज्ञो गदाय़ुद्धविशारदः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
गदाय़ुद्धसमाचारं वुध्यमानः स वीर्यवान् |
६० क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
गदाय़ुद्धे न मे कश्चित्सदृशोऽस्तीति चिन्तय़ |
६० क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
गदाय़ुद्धेऽसिचर्याय़ां तोमरप्रासशक्तिषु |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
दुर्योधन उवाच
गदिनं कोऽद्य मां पाप जेतुमुत्सहते रिपुः |
४८ क