द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
गदी भुशुण्डी मुसली हली च; शरासनी वारणतुल्यवर्ष्मा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
गदो वा सारणो वापि साम्वो वा सह वृष्णिभिः |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
गदोल्मुकौ वाहुकभानुनीथाः; शूरश्च सङ्ख्ये निशठः कुमारः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा गदिनां श्रेष्ठो नृत्यन्निव महारथः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
गदय़ा चतुरो वाहान्राज्ञस्तस्य तदावधीत् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा ताडितं दृष्ट्वा केशवं परवीरहा |
६० क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
गदय़ा ताडय़ामास विनद्य रणकर्कशः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा ताडय़ामास सा गदा भीममाव्रजत् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
गदय़ा तेन चास्त्रेण स्थूणाकर्णेन राक्षसी ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
दुर्योधन उवाच
गदय़ा त्वां महावाहो विजेष्यामि सहानुजम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
गदय़ा निहतो ह्याजौ मम पार्थो वृकोदरः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा पुरुषव्याघ्र हेमपट्टविनद्धय़ा ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
गदय़ा पोथय़ामास साश्वसूतध्वजं रणे ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा भारतः क्रुद्धो वज्रेणेन्द्र इवासुरान् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा भीमसेनस्तु कर्णस्य रथकूवरम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा भीमसेनेन नाराचैरर्जुनेन च ||
५२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा भीमसेनेन निर्भिन्ने सक्थिनी तव ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा भीमसेनेन निहतौ शूरमानिनौ ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा भीमसेनेन भिन्नकुम्भान्रजस्वलान् |
३० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
गदय़ा भीमसेनेन भूय़िष्ठं निहतान्रणे ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
गदय़ा भीमसेनेन हताः शममुपैष्यथ ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा मद्रराजेन सव्यदक्षिणमाहतः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा मद्रराजेन सव्यदक्षिणमाहतः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा युद्धकुशलस्तय़ा दारुणनादय़ा |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा राक्षसो घोरो निजघान ननाद च ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा वध्यमानास्ते मार्गणैश्च समन्ततः |
६० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
गदय़ा वीरघातिन्या पश्य माधव मे सुतम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
गदय़ा वीरघातिन्या फलानीव वनस्पतेः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा वीरघातिन्या यथोत्साहं महामनाः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
गदय़ा वो हनिष्यामि सर्वानेव समागतान् |
६० ख
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
गदय़ाताडय़त्सव्ये पार्श्वे वानरपुङ्गवम् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
गदय़ाभिहतो भीमो मुह्यमानो महारणे |
४८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
गन्तव्यं कर्मणामन्ते सर्वेण मनुजाधिप |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
अर्जुन उवाच
गन्तव्यं न चिरं स्थातुमिह शक्यमरिन्दम ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
गन्तव्यमधिभूतं च विष्णुस्तत्राधिदैवतम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
गन्ता गतिमतां कालः कालः कलय़ति प्रजाः ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
गन्तारस्ते महेन्द्रस्य पूर्वैः सह सलोकताम् ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वासुदेव उवाच
गन्तासि लोकान्पुरुषप्रवीर; नावर्तते यानुपलभ्य विद्वान् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
गन्तास्मि कथमानृण्यं गतानां यमसादनम् ||
१३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
गन्तास्मि पदवीं राज्ञः पितुश्चापि महाद्युतेः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
गन्तुं गृहं गृहे चाहं धीमन्न स्थातुमुत्सहे |
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
नाग उवाच
गन्तुमर्हसि विप्रर्षे वृक्षमूलगतो यथा ||
५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
गन्तुमिच्छामि तत्राहं यत्र मे भ्रातरो गताः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
गन्ध एवाधिभूतं तु पृथिवी चाधिदैवतम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
गन्धपङ्कां शव्दजलां स्वर्गमार्गदुरावहाम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धमादनपादांश्च मेरुं चापि शिलोच्चय़म् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धमादनपादेषु परेष्वपरगण्डिकाः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
गन्धमादनमासाद्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
गन्धमादनमासाद्य वदर्यां च तपोरतः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादनः |
५ क