वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम |
१७२ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
८२
यय़ातिरु उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्मध्ये कृत्स्नोऽय़ं विषय़स्तव |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्मध्ये मूर्तिमानिव सागरः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्मध्ये यामुनस्य गिरेरधः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्मध्ये सङ्ग्रामे विनिपातितः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्वारि जालैरभ्यकिरंस्ततः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्वीर सङ्गमं लोकविश्रुतम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोर्वेगं सुभीमं भीमनिःस्वनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोश्चैव सङ्गमे सत्यसङ्गराः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
गङ्गाय़मुनय़ोस्तीर्थे तथा कालञ्जरे गिरौ |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
गङ्गाय़ा उत्तरे कूले वप्रान्ते राजसत्तम |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४१
भीष्म उवाच
गङ्गाय़ा दक्षिणे तीरे कश्चिद्विप्रः समाहितः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
गङ्गाय़ा दर्शनात्तद्वत्सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
गङ्गाय़ा धारणं कृत्वा हरो लोकनमस्कृतः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
गङ्गाय़ां कन्यकुव्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
गङ्गाय़ां तु नरः स्नात्वा व्रह्मचारी समाहितः |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
गङ्गाय़ां हि न शक्नोमि वृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
गङ्गाय़ाः सुरनद्या वै स्वादुभूतं यथोदकम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गाय़ाः सूतविषय़ं चम्पामभ्याय़यौ पुरीम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गाय़ाः स्तवसंय़ुक्तं स मुच्येत्सर्वकिल्विषैः ||
१०५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
गङ्गाय़ामसुरः कश्चिद्भैरवं नादमुत्सृजत् ||
५५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
गङ्गाय़ामाप्लुतो धीमानाश्रमाभिमुखोऽभवत् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
गङ्गाय़ाश्च नरश्रेष्ठ सरस्वत्याश्च सङ्गमे |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
गङ्गाय़ास्तीरमागम्य हते शान्तनवे नृपे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
गङ्गाय़ास्त्वथ राजेन्द्र सागरस्य च सङ्गमे |
४ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
गङ्गाय़ास्त्वपरं द्वीपं प्राप्य यः स्नाति भारत |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गेव पूर्णा दुर्धर्षा समदृश्यत वाहिनी ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गेव पूर्णा स्तिमिता स्यन्दमाना व्यदृश्यत ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
गङ्गेव पूर्णा स्तिमिता स्यन्दमाना व्यदृश्यत ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
गङ्गोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
गङ्गोर्मिभिरथो दिग्धः पुरुषं पवनो यदा |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
गङ्गोर्मिभिर्भानुमतीभिरिद्धः; सहस्ररश्मिप्रतिमो विभाति ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गौघप्रतिमा राजन्प्रय़ाता सा महाचमूः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
गङ्गय़ा सहिताः सर्वे प्रणिपेतुर्जगत्पतिम् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
गच्छ केदारखण्डं वधानेति ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
७२
दमय़न्त्यु उवाच
गच्छ केशिनि जानीहि क एष रथवाहकः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
गच्छ केशिनि भूय़स्त्वं परीक्षां कुरु वाहुके |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
गच्छ गच्छ द्रुतं पार्थ ध्रुवोऽद्य विजय़ो मम ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
गच्छ गच्छ न ते स्थानं प्रीणात्यस्मानिह ध्रुवम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
गच्छ गच्छेति च पुनर्भीमसेनमभाषत |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
गच्छ गच्छेति तां शाल्वः पुनः पुनरभाषत |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ जानीहि के त्वेते शेरते वनमाश्रिताः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ जानीहि को न्वस्या नाथ इत्येव कोटिक ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ जानीहि सौम्यैनां कस्य का च कुतोऽपि वा |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ तात महाप्राज्ञां गान्धारीं दीर्घदर्शिनीम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
भीष्म उवाच
गच्छ तावद्दिशं पुण्यामुत्तरां द्रक्ष्यसे ततः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
गच्छ तूर्णं रथेनैव तत्र तिष्ठति सात्यकिः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
द्रौपद्यु उवाच
गच्छ त्वं कितवं गत्वा सभाय़ां पृच्छ सूतज |
७ क