उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
शास्त्रदृष्टेन विधिना पुत्रप्रीत्या जनार्दन ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
शास्त्रदृष्टेन विधिना संय़ुक्ता भरतर्षभ |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
शास्त्रदृष्टेन विधिना संय़ोज्यात्मानमात्मना |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
शास्त्रदृष्टेन विधिना सम्भारैश्च सुसम्भृतैः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
शास्त्रदोषान्न पश्यन्ति इह चामुत्र चापरे |
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
शास्त्रनित्यः पुनर्धर्मं तस्य ह्रीरङ्गमुत्तमम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
शास्त्रनित्या जितक्रोधा वलवन्तो रणप्रिय़ाः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
शास्त्रनीतेन लिप्सेथा वेतनेन धनागमम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
शास्त्रप्रमाणात्सूक्ष्मं तु विधिं पार्थिव संस्मरन् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
शास्त्रमार्गानुसारेण तद्विद्धि मनुजर्षभ ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रवत्कल्पितं सङ्ख्ये त्रिसाहं युद्धदुर्मदम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजय़ामास धर्मराट् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
शास्त्रवुद्ध्या विनिश्चित्य कृत्वा वुद्धिं वधे दृढाम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रवुद्ध्या स्ववुद्ध्या च न चचाल युधिष्ठिरः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
शास्त्रवेदाङ्गविदुषामेतद्ध्यानं परं पदम् ||
५६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रागमाश्च विविधा वृद्धेभ्यो नृपसत्तम |
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
शम्वर उवाच
शास्त्राणि वदतो विप्रान्संमन्यामि यथासुखम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
शास्त्रातिगो मन्दवुद्धिर्यो धर्ममतिशङ्कते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
शास्त्रादपेतं पश्यन्ति वहवो व्यक्तमानिनः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
शास्त्राद्वा सुप्रतर्काद्वा सुस्थिरः स्थविरो ह्यसि ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
शास्त्रार्थं तत्त्वतो गन्तुं न समर्थः कथञ्चन ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
शास्त्रार्थदर्शनाद्राजंस्तप एवानुपश्यति ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
शास्त्रार्थसूक्ष्मदर्शी यो धर्मनिश्चय़कोविदः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
शास्त्राल्लोकाच्च यो वुद्धः सर्वं पश्यति मानवः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
शास्त्रैश्च वहुभिर्भूय़ः श्रेय़ो गुह्यं प्रवेशितम् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
शास्त्रोक्तं योजय़ामासुस्तद्देवय़जनं महत् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
शास्त्रय़ोगपरा भूत्वा स्वमात्मानं परीप्सवः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
शास्वतं चाव्ययं चैव अक्षरं चाभय़ं च यत् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
शिंशपा मेषशृङ्गश्च तथा कीचकवेणवः |
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
इन्द्र उवाच
शिक्ष मे भवनं गत्वा सर्वाण्यस्त्राणि भारत |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
शिक्षस्वैनं नमस्वैनं मा ते भूद्वुद्धिरीदृशी ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
शिक्षा प्रसादश्च वलं धृतिश्च; द्रोणे महास्त्राणि च संनतिश्च |
४६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
४
विदुर उवाच
शिक्षां क्षिपति चान्येषां नात्मानं शास्तुमिच्छति ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
शिक्षां प्रभावं वीर्यं च प्रमाणं दर्पमेव च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
शिक्षान्याय़ोपसम्पन्नं द्रोणशिष्याय़ पृच्छते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
शिक्षावलसमुद्भूताः सर्वय़ोधप्रहर्षणाः ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
शिक्षावलेन निहतं पित्रा तव विशां पते ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
शिक्षितैर्युद्धकुशलैरुपेतानां नरोत्तमैः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
शिक्षितो ह्यस्मि सारथ्ये तीर्थतः पुरुषर्षभ ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
गान्धार्यु उवाच
शिक्षय़ाभ्यधिकं ज्ञात्वा चरन्तं वहुधा रणे |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
शिक्षय़िष्याम्यहं राजन्विराटभवने स्त्रिय़ः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डितनय़ो युद्धे क्षत्रदेवो युधां पतिः |
७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डिनं च कौन्तेय़ो याहि याहीत्यचोदय़त् |
५८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं द्रौपदेय़ांश्च सर्वशः |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं सहदेवं च मागधम् ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डिनं च पुत्रास्ते पाण्डवं च धनञ्जय़म् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डिनं च भीष्माय़ प्रमुखे समकल्पय़त् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डिनं च विव्याध त्रिभिः पञ्चभिरेव च ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
शिखण्डिनं च विव्याध शरैर्वहुभिराय़सैः ||
३४ ग