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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत्पूजिता वय़म् |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
गम्यतां पुत्र मैव त्वं वोचः कुरु वचो मम ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
कुन्त्यु उवाच
गम्यतां भगवंस्तत्र यतोऽसि समुपागतः |
११ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
गम्यतां भद्र येषां त्वं दूतस्तेषामुपान्तिकम् ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
गम्यतां भीष्म युद्धेऽस्मिंस्तोषितोऽहं भृशं त्वय़ा ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
गम्यतां स वधोपाय़ं प्रष्टुं सागरगासुतः |
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
व्रह्मो उवाच
गम्यतां साधय़िष्यामि यथास्थानानि सिद्धय़े ||
२९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
गम्यतां साधय़िष्यामो वय़ं ह्यग्निभय़ात्सुराः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
गम्यतां स्वपुरं पुत्र विश्रान्तः पुनरेष्यसि |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
गम्यतां स्वमधिष्ठानं सुतस्नेहं विसृज्य वै ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
गम्यतामद्य विप्रर्षे श्रेय़स्ते कथय़ाम्यहम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
गम्यतामिति ||
९२ 7
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
गम्यतामिति ||
१३३ ग
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
गम्यतामिति चोक्त्वा मां सीता प्रादादिमं मणिम् |
६६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
गम्यतामिति तं चाहं प्रणम्य शिरसावदम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २००
वैशम्पाय़न उवाच
गम्यतामिति होवाच भगवांस्तामनिन्दिताम् ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
गम्यतामित्यनुज्ञाय़ जय़माप्नुहि चेत्यथ ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
गम्यन्ते निय़मैः श्रेष्ठैर्दानैर्वा विधिपूर्वकैः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
गम्यागम्यं तदा नासीत्परस्वं स्वं च वै समम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
गम्यान्यपि च तीर्थानि कीर्तितान्यगमानि च |
८८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
गमय़ामास राजेन्द्र द्रौणिर्यमनिवेशनम् ||
१२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
संवर्त उवाच
गमय़िष्यामि चेन्द्रेण समतामपि ते ध्रुवम् |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
गमय़िष्यामि पाञ्चालान्पदवीमद्य दुर्गमाम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
गमय़िष्यामि वाणैस्त्वां युधि वैवस्वतक्षय़म् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
गरीय़सः पूजय़ेदात्मशक्त्या; सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
गरीय़सां गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेय़सामपि ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
गरीय़सोऽवजानातु यस्ते हरति पुष्करम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
गरीय़ांसो गरीय़ांसमपराधे पुनः पुनः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
शकुनिरु उवाच
गरीय़ांसौ तु ते मन्ये भीमसेनधनञ्जय़ौ ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
गरीय़ान्व्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद्यतः |
८० क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
गरुडप्रहतैरुग्रैः पञ्चास्यैरिव पन्नगैः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
गरुडस्तत्तु शुश्राव यथावृत्तं महावलः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
गरुडस्य गतौ तुल्याश्चक्राङ्गा हृष्टचेतसः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
गरुडस्य स्वय़ं तुण्डे पिता देवव्रतस्तव |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
गरुडस्येव पततः पन्नगार्थे यथा पुरा ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
गरुडस्येव पततो जिघृक्षोः पन्नगोत्तमम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
गरुडा वज्रसदृशैः पक्षतुण्डनखैस्तथा |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
गरुडाननाः खड्गमुखा वृककाकमुखास्तथा |
७९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
गरुडानिलरंहोभिर्यन्तुर्वाक्यकरैर्हय़ैः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गरुडो दय़ितं पुत्रं मय़ूरं चित्रवर्हिणम् |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय २०
अग्निरु उवाच
गरुडो वलवानेष मम तुल्यः स्वतेजसा ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
गरुडोऽपि यथाकालं जज्ञे पन्नगसूदनः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
गरुत्मन्तं महावेगमावभाषे स्मय़न्निव ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
गरुत्मन्भुजगेन्द्रारे सुपर्ण विनतात्मज |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
गरुत्मन्मन्यसेऽऽत्मानं वलवन्तं सुदुर्वलम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
गरुत्मान्पक्षिराट्तूर्णं सम्प्राप्तो विवुधान्प्रति ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
गर्गस्रोतो महातीर्थमाजगामैककुण्डली ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
गर्जतां सागरौघाणां यथा स्यान्निस्वनो महान् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
गर्जतो राजशार्दूल शक्रप्रह्रादय़ोरिव ||
६२ ख