आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
जिघांसुर्वासुदेवश्च चक्रमुद्यम्य विष्ठितः ||
३६ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुस्तोमरैः क्रुद्धो दण्डपाणिरिवान्तकः ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
जिघांसू परमक्रुद्धावभिजघ्नतुराहवे ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
जिघांसूनुपसम्प्राप्तान्देवान्दृष्ट्वा स पावकिः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
जिघृक्षति महासिंहे गजानामिव यूथपम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
जिघृक्षतो रक्ष्यमाणः सामरैरपि पाण्डवैः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
जिघृक्षुर्वारिजं किञ्चिदथ वा मृगलिप्सय़ा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
जिघ्रति घ्राणमित्याहू रसं जानाति जिह्वय़ा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
जिघ्रती भवति घ्राणं वुद्धिर्विक्रिय़ते पृथक् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
जिघ्रन्सोम्य वसागन्धं सर्पिर्जतुविमिश्रितम् ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
जिघ्रमाणो महातेजाः सर्वर्तुकुसुमोद्भवम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
जिज्ञासन्तो हि धर्मस्य सन्दिग्धस्य वृकोदर |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
जिज्ञासमानः स्ववलमभ्ययादलकाधिपम् ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
जिज्ञासमानास्तत्तेजः सौप्तिकं च दिदृक्षवः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
जिज्ञासमानौ धर्मे त्वां यज्ञवाटमुपागतौ ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३०
लोमश उवाच
जिज्ञासमानौ वरदौ महात्मानमुशीनरम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
जिज्ञाससि च मां राजंस्तन्निवोध यथाश्रुतम् ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
जिज्ञासा तु न कर्तव्या धर्मस्य परितर्कणात् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवलः ||
२४ ग
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
जिज्ञासार्थं मय़ा ह्येतदाहृतं मृगरूपिणा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
जिज्ञासुः सर्वदेवेशः कपर्दी भगवान्स्वय़म् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
जिज्ञासुरपि योगस्य शव्दव्रह्मातिवर्तते ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
जिज्ञासुरिह सम्प्राप्तस्तवाहं राजसत्तम |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
जिज्ञासुर्लभते कामान्भक्तो भक्तगतिं व्रजेत् ||
११८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
जिज्ञासुर्ह्येष वै पुत्र वलस्य तव कौरवः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद्विप्रिय़े कृते |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
जिज्ञासेय़ं प्रय़ुक्ता मे स्थिरीकर्तुं तवानघ |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
अष्टावक्र उवाच
जिज्ञासेय़मृषेस्तस्य विघ्नः सत्यं नु किं भवेत् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
९७
अगस्त्य उवाच
जिज्ञास्यतां रथः सद्यो व्यक्तमेष हिरण्मय़ः ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
जिज्ञास्यमानः स रथः कौन्तेय़ासीद्धिरण्मय़ः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
जिज्ञासय़ैवाथ कुरूत्तमानां; द्रव्याण्यनेकान्युपसञ्जहार ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
जितं त्वां मन्यते साधो तेनासि हरिणः कृशः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
वैशम्पाय़न उवाच
जितं भगवता तेन पुरुषेणेति भारत |
१२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
जितं स मन्यते सर्वं दुरात्मा कर्णमाश्रितः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
जितः कः पर्यवस्थाता कोऽत्र यो न मय़ा जितः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
जितः क्रोधस्त्वय़ा कृष्ण प्रकृत्यैव महाभुज ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
जितकाशिनश्च खचरास्त्वरिताश्च महारथाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
जितकाशिनि शूरे च सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनि |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
जितकाशिनो लव्धलक्षा युद्धशौण्डाः प्रहारिणः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७८
भृगुरु उवाच
जितक्लमासना धीरा मूर्धन्यात्मानमादधुः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
जितक्लमासना धीरा मूर्धन्यात्मानमादधुः |
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०६
वैशम्पाय़न उवाच
जिततन्द्रीस्तदा पाण्डुर्वभूव वनगोचरः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
जितमर्थं विजानीय़ादवुधो मार्दवे सति ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव तानक्षान्पुनरेवान्वपद्यत ||
४३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||
१८ ख