वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
श्यामाय़ाः पद्मसङ्काशो लक्षितोऽन्तर्हितो मय़ा ||
५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
श्यामाय़ास्त्वाश्रमं गत्वा उष्य चैवाभिषिच्य च |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
श्यामो ग्रहः प्रज्वलितः सधूमः सहपावकः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
श्यामो य एष रक्ताक्षो वृहच्छाल इवोद्गतः |
६६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
श्यामो यस्मात्प्रवृत्तो वै तत्ते वक्ष्यामि भारत |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीय़श्च पाण्डवः |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीय़ो महाभुजः ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
श्यामो युवा लोहिताक्षः सिंहस्कन्धो महाभुजः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
श्यामो युवा लोहिताक्षो मत्तवारणविक्रमः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
श्यामो युवा संहननोपपन्न; एषो हि वीरो वहुभुक्सदैव ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
श्यामौ वृहन्तौ तरुणौ शालस्कन्धाविवोद्गतौ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
श्यावभूतनरप्राय़ा वभूव वसुधा तदा ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
श्येनः पतत्रिणामादिर्यज्ञानां हुतमुत्तमम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम् |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
श्येनवच्चरता सङ्ख्ये नकुलेन निपातितः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
श्येनवद्व्यचरत्क्रुद्धः शिखण्डी शत्रुतापनः ||
२८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
श्येनवद्व्यचरद्भीमो रणे रिपुवलोत्कटः ||
४० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
श्येना गृध्राश्च काकाश्च कङ्काश्च सहिता वलैः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
श्येना यथैवामिषसम्प्रय़ुक्ता; जवेन तत्सैन्यमथाभ्यधावन् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
श्येनाः कपोतान्खादन्ति स्थितिरेषा सनातनी |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
श्येनानुचरितैर्ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
जरितो उवाच
श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुर्न संशय़ः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
श्येनेन व्यूहराजेन तेनाजय़्येन संय़ुगे ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
श्येनौ यथा पक्षिपूगान्रुजन्तौ; माद्रीपुत्रौ नेह कुरून्विशेताम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
श्रद्दधस्व मम व्रह्मन्नान्यथा कर्तुमर्हसि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
श्रद्दधानः शुभां विद्यां हीनादपि समाचरेत् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
श्रद्दधानः सदोद्युक्तः सत्यधर्मपराय़णः |
१९८ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
श्रद्दधानस्य पूय़न्ते सर्वपापान्यशेषतः ||
१९१ ग
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
श्रद्दधानस्य पूय़न्ते सर्वपापान्यशेषतः ||
४५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
युधिष्ठिर उवाच
श्रद्दधानस्य वदतः स्पृहा मे सा कथं भवेत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
श्रद्दधाना जितक्रोधा दानशीलानसूय़काः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रिय़ाः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च धनाढ्याः शुभकारिणः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
श्रद्दधानेन भाव्यं वै गच्छामि मिथिलामहम् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
श्रद्दधानेन सततं शिष्टसम्प्रतिपत्तय़े ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
श्रद्दधानो हि तद्वाक्यं देवस्याद्भुततेजसः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
श्रद्दधानोऽनसूय़श्च शतं वर्षाणि जीवति ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
श्रद्धत्स्वैतन्मय़ा प्रोक्तं यदि तेऽस्ति जिजीविषा ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
श्रद्धा च गुरुशुश्रूषा यमय़ोः पुरुषाग्र्ययोः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
श्रद्धा च नो मा व्यगमन्मा च याचिष्म कञ्चन ||
११४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
श्रद्धा ते जपतो नित्यं भवितेति विशां पते ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
श्रद्धा मे जीवितस्यापि छिन्ना किं जीवितेन मे ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
श्रद्धा वै सात्त्विकी देवी सूर्यस्य दुहिता नृप |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
श्रद्धातव्यं श्रद्दधानेन नित्यं; न श्रद्धिनं जन्ममृत्यू विशेताम् ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
श्रद्धादमपुरस्कारैर्वृतश्चन्द्र इव ग्रहैः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
श्रद्धान्विताय़ाथ गुणान्विताय़; परापवादाद्विरताय़ नित्यम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
श्रद्धापवित्रमाश्रित्य यथाशक्ति प्रय़च्छता ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धय़ेतरत् |
१० ख