द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
कदर्थीकृत्य राजेन्द्र शरवर्षैरवाकिरत् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
कदर्थीकृत्य विशिखैः फल्गुनाभ्येति सात्यकिः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
कदर्थीकृत्य स मुनिरिषीकाभिरपानुदत् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
कदर्यभावे न रमेन्मनः सदा; नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
कदर्यमाक्रोशकमश्रुतं च; वराकसम्भूतममान्यमानिनम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
कदलीगर्भनिःसारो नौरिवाप्सु निमज्जति ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
कदलीदण्डसदृशं सर्वलक्षणपूजितम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
कदलीवनभूय़िष्ठमिष्टं कान्तं मनोरमम् ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
कदलीवनमध्यस्थमथ पीने शिलातले |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
कदलीषण्डमध्यस्थो निद्रावशगतस्तदा |
६० क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
कदलीसंनिभो लोकः सारो ह्यस्य न विद्यते ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
कदल्य इव वातेन धूय़मानाः समन्ततः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
कदा तु तं क्रतुवरं राजसूय़ं महाधनम् |
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
कदा द्रक्ष्यामि तां देवीं यदि जीवति सा पृथा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
कदा नु खलु दुःखस्य पारं यास्यति वै शुभा |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
कदा नु जननीं श्रान्तां द्रक्ष्यामि भृशदुःखिताम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
कदा नु रामो भगवांस्तापसान्दर्शय़िष्यति |
४ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
कदा नु स्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कदा वा घोषिका गाथाः पुनर्गास्यन्ति शाकले |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
कदा वा सूतपुत्र त्वं जानीषे मां भय़ार्दितम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
कदा विमोक्ष्यसे मूढ धनेहां धनकामुक ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
कदा वै प्रस्थिता यूय़ं किमर्थमिह चागताः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
कदा वय़ं करिष्यामः संन्यासं दुःखसञ्ज्ञकम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
कदा वय़ं भविष्यामो राज्यं हित्वा परन्तप ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
कदाचित्कालय़ोगेन सर्वप्राणिविहिंसकः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
कदाचित्तज्जलस्थाय़ं मत्स्यवन्धाः समन्ततः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कदाचित्तत्र मार्जारस्त्वप्रमत्तोऽप्यवध्यत ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
कदाचित्तस्य नृपते देवलस्य महात्मनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
कदाचित्तस्य वृद्धस्य यतमानस्य यत्नतः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
कदाचित्तु तथैवास्य विनिष्क्रान्ताः सुताः प्रभो |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
कदाचित्त्वेव खल्वेतदाहुरप्रतिवुद्धकम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
कदाचित्पुनरभ्येत्य पुनर्गच्छन्ति सन्ततम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
कदाचित्प्रातरुत्थाय़ पिस्पृक्षुः सलिलं शुचि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
कदाचित्सुकृतं तात कूटस्थमिव तिष्ठति |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
कदाचिदटमानस्तु महर्षिरुत लोमशः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४१
भीष्म उवाच
कदाचिदतिथिः प्राप्तो व्राह्मणः सुसमाहितः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
कदाचिदथ मत्सीं तां ववन्धुर्मत्स्यजीविनः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
कदाचिदष्टमे मासि कदाचिद्दशमे तथा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
कदाचिद्दर्शनादासां दुर्वलानाविशेद्रजः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
कदाचिद्दिवसान्पञ्च समुत्पत्य विहङ्गमाः |
३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
कदाचिद्दृश्यते विप्रैः शून्येऽस्मिन्कानने क्वचित् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
कदाचिद्धि ततो राजन्भ्रातरावेकतद्वितौ |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
११५
भृगुरु उवाच
कदाचिद्भृगुरागच्छत्तं च वेद विपर्ययम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
कदाचिद्रममाणस्य हस्तिनः सुमुखं तदा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
कदाचिद्विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैर्वृताम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
कदाचिद्व्यसनं प्राप्य सन्धिं कुर्यान्मय़ा सह |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
कदाचिन्मासमात्रेण समुत्पत्य विहङ्गमाः |
३७ क