आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ त्वं त्यागमास्थाय़ युक्ता वस तपोवने |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
गच्छ त्वं द्रौपदेय़ाश्च शकुनिं सौवलं जहि |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
गच्छ त्वं भुङ्क्ष्व राजेन्द्र पृथिवीं निहतेश्वराम् |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
ईश्वर उवाच
गच्छ त्वं मदनुध्यानान्निहनिष्यसि दानवान् |
१४८ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
गच्छ त्वं रथमास्थाय़ हय़ैर्वातसमैर्जवे |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ त्वं वै गोपते स्वं विमानं; कन्याभावाद्दुःख एषोपचारः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
गच्छ त्वं व्राह्मणग्रामं ततो गत्वा तमानय़ |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
गच्छ त्वं समनुज्ञातो यत्र यातो धनञ्जय़ः ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ त्वमनवद्याङ्गि तामानय़ वृहन्नडाम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
गच्छ त्वमपि कौन्तेय़मात्मार्थेभ्यो हि माचिरम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
गच्छ दुर्जय़ राधेय़ं पुरा ग्रसति पाण्डवः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
चित्रसेन उवाच
गच्छ दुर्योधनं वद्ध्वा सामात्यं त्वमिहानय़ ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ द्वैतवनं शीघ्रं पाण्डवान्पापपूरुषान् |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
गच्छ धर्म न मे श्रद्धा स्वर्गं गन्तुं विनात्मना ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ नीचिकय़ा गत्या यथा चैनां न पीडय़ेः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
गच्छ पारं समुद्रस्य दक्षिणस्य महामुने |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
अर्जुन उवाच
गच्छ पुण्यकृताँल्लोकाञ्शिविरौशीनरो यथा ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
गच्छ पौष्यं राजानम् |
१०० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
गच्छ भद्रे पुनस्तत्र सकाशं भारतस्य वै |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ मद्वचनाद्देवीं व्रूहि देहीति सत्तम ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
गच्छ मद्वचनाद्रामं जामदग्न्यं तपस्विनम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ युक्तः सदा भूत्वा कुरु वै शासनं मम ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
गच्छ युध्यस्व कौन्तेय़ न तवास्ति पराजय़ः |
१०६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ युध्यस्व धर्मेण क्षात्रेण भरतर्षभ ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
राम उवाच
गच्छ युध्यस्व धर्मेण प्रीतोऽस्मि चरितेन ते ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
शल्य उवाच
गच्छ युध्यस्व विस्रव्धं प्रतिजाने जय़ं तव ||
८२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
गच्छ रक्षस्व हैडिम्वं संशय़ं परमं गतम् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
गच्छ राजन्कृतार्थोऽसि निवर्त मनुजाधिप ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
गच्छ राजन्नितः सूतो वाहुकोऽहमिति व्रुवन् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
गच्छ राजानमासाद्य स्वकर्म प्रथय़स्व वै ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
गच्छ लक्ष्मण जानीहि किष्किन्धाय़ां कपीश्वरम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
गच्छ लोकाञ्जितान्स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ||
११६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
गच्छ लोकानरजसो यत्र गत्वा न शोचसि ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
अश्वत्थामो उवाच
गच्छ वत्स सहान्यैस्त्वं युध्यस्वामरविक्रम |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ वा तिष्ठ वा कामं यद्वापीच्छसि तत्कुरु ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
भीम उवाच
गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे यद्वापीच्छसि तत्कुरु |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ वा तिष्ठ वा यद्वा कार्यं ते तत्समाचर ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
गच्छ वा तिष्ठ वा शक्र यथेष्टं वलसूदन ||
१०३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
गच्छ वा यत्र तौ कृष्णौ तौ त्वा रक्षिष्यतो रणे |
७९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
गच्छ विप्र त्वमद्यैव आलय़ं स्वं महाद्युते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
राजो उवाच
गच्छ विप्र मय़ा सार्धं जापकं फलमाप्नुहि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
गच्छ वीर न ते वुद्धिरन्या कार्या कथञ्चन |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ वीर स्वमावासं स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ वै शय़नाय़ैव पुरा नान्योऽववुध्यते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत्कार्यं तन्मय़ा कृतम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
गच्छ शीघ्रं महाराज हैडिम्वं युद्धदुर्मदम् |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ शीघ्रं स्वकं स्थानं लोकान्धारय़ शोभने ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
गच्छ शैनेय़ जानीहि गत्वा राजनिवेशनम् |
१० क