उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
गालवोऽपि सुपर्णेन सह निर्यात्य दक्षिणाम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
गावः कामदुघा देव्यो नान्यत्किञ्चित्परं स्मृतम् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
गावः पवित्राः पुण्याश्च पावनं परमं महत् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावः पश्यन्तु मां नित्यं गावः पश्याम्यहं तदा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
गावः पिवन्ति पानीय़ं साधवश्च नराः सदा ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
गावः पिवन्ति विप्राश्च साधवश्च नराः सदा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
गावः पुण्याः पवित्राश्च पावनं धर्म एव च ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
गावः प्रतिन्यवर्तन्त दिशमास्थाय़ दक्षिणाम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
गावः प्रतिष्ठमानानां पुत्रः प्रवदतां वरः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
गावः प्रतिष्ठा भूतानां तथा गावः पराय़णम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
गावः शरण्या भूतानामिति वेदविदो विदुः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
गावः श्रेष्ठाः पवित्राश्च पावनं ह्येतदुत्तमम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावः सुरभिगन्धिन्यस्तथा गुग्गुलुगन्धिकाः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
गावः सुवर्णं च तथा तिलाश्चैवानुवर्णिताः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
गावः स्वर्गस्य सोपानं गावः स्वर्गेऽपि पूजिताः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
गावल्गणिः सञ्जय़ः सूतसूनु; रजातशत्रुमवदत्प्रतीतः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
गावल्गणिरिदं धीमान्महार्थं वाक्यमव्रवीत् ||
१६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
व्यास उवाच
गावल्गणिरय़ं जीवन्युद्धादस्माद्विमोक्ष्यते ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
गावल्गणिस्तु तत्पृष्टः सभाय़ां कुरुसंसदि |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
गावल्गणे कुरून्गत्वा धृतराष्ट्रं महावलम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
गावल्गणे व्रूहि नः सारफल्गु; स्वसेनाय़ां यावदिहास्ति किञ्चित् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
गावल्गणे सञ्जय़ स्वागतं ते; प्रीतात्माहं त्वाभिवदामि सूत |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
धृतराष्ट्र उवाच
गावल्गणेऽत्र का भक्तिर्या ते नित्या जनार्दने |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
गावश्च पृथिवीपाल गौर्मूल्यं परिकल्प्यताम् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
गावश्च वहुलास्तत्र न कृशा न च दुर्दुहाः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
गावश्चतुष्पदामादिर्मनुष्याणां द्विजातय़ः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
गावश्चैव प्रतिष्ठन्तां सेनां व्यूहन्तु माचिरम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
गावस्तुष्टाः प्रय़च्छन्ति सेविता वै न संशय़ः ||
४३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
गावस्तेजः परं प्रोक्तमिह लोके परत्र च |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
गावस्तेजो महद्दिव्यं गवां दानं प्रशस्यते ||
१६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावो ददति वै होम्यमृषिभ्यः पुरुषर्षभ ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
गावो ददन्तः सततं सहस्रशतसंमिताः |
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३९
युधिष्ठिर उवाच
गावो नवतृणानीव गृह्णन्त्येव नवान्नवान् ||
४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावो भूतं भविष्यच्च गावः पुष्टिः सनातनी |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
गावो ममैनः प्रणुदन्तु सौर्या; स्तथा सौम्याः स्वर्गय़ानाय़ सन्तु |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
गावो महार्थाः पुण्याश्च तारय़न्ति च मानवान् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तय़ेत् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावो मामुपतिष्ठन्तु हेमशृङ्गाः पय़ोमुचः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
गावो यज्ञप्रणेत्र्यो वै तथा यज्ञस्य ता मुखम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावो यज्ञस्य हि फलं गोषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
गावो राष्ट्रस्य कुरुभिः काल्यन्ते नो वृहन्नडे |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
गावो लक्ष्म्याः सदा मूलं गोषु पाप्मा न विद्यते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावो लक्ष्म्यास्तथा मूलं गोषु दत्तं न नश्यति |
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
गावो लोकान्धारय़न्ति क्षरन्त्यो; गावश्चान्नं सञ्जनय़न्ति लोके |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
गावो हि सुमहत्तेजः प्राणिनां च सुखप्रदाः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
गावोऽथ विस्मितास्तस्या दृष्ट्वा रूपस्य सम्पदम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
गावोऽधिकास्तपस्विभ्यो यस्मात्सर्वेभ्य एव च |
३६ क