अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गावोऽस्माकं वय़ं तासां यतो गावस्ततो वय़म् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
गावौ हि कपिले क्रीत्वा वत्सले वहुदोहने ||
९३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
गाश्च किम्पुरुषान्मत्स्यानौद्भिदांश्च वनस्पतीन् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
अत्रिरु उवाच
गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसञ्चय़म् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
गाश्च वासांसि च पुनः समाभाष्य परस्परम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
गाश्च सङ्कीर्तय़ेन्नित्यं नावमन्येत गास्तथा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
गाश्चक्रे वहुमानं च तासु नित्यं युधिष्ठिर ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
गाश्चैव द्विजमुख्यांश्च पृथिवीं मातरं तथा |
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
गाश्चैव महिषीश्चैव तथा वृद्धाः स्त्रिय़ोऽपि च |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
गाश्चैव राजन्नथ चैव रज्जू; र्द्रव्याणि चान्यानि कृषीनिमित्तम् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
गाश्चैषां क्षिप्रमादाय़ पुनराय़ामि स्वं पुरम् ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
गास्तस्यापहरामाशु सह सर्वैः सुसंहताः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
गास्तु शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
गाहमानमनीकानि महेन्द्रसदृशप्रभम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
गाहमानमनीकानि मातङ्गमिव यूथपम् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
गाहमानमनीकानि युध्यमानं महारथैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
धृतराष्ट्र उवाच
गाहमानमनीकानि सदश्वैस्तं त्रिहाय़नैः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
गाहमानश्च तत्तोय़मन्तरिक्षात्स शुश्रुवे ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
गाहमानस्त्वनीकानि तूर्णमश्वानचोदय़त् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
गाहमानस्य ते सेनां मालवस्येन्द्रवर्मणः |
१०१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
गाहमानेषु योधेषु परस्परवधैषिषु ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
गाय़तां पर्वतेन्द्रस्य दिवस्पृगिव निस्वनः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
गाय़त्री छन्दसामादिः पशूनामज उच्यते |
६ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
गाय़त्रीं पठते यस्तु योनिसङ्करजस्तथा |
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
गाय़द्भिर्नृत्यमानैश्च उत्पतद्भिरितस्ततः |
११८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
गाय़ना नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
गाय़नाख्यानशीलाश्च नटा वैतालिकास्तथा |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
गाय़नो हसनश्चैव वाणः खड्गश्च वीर्यवान् |
६२ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
गाय़न्गच्छति मार्गेषु कुशानादाय़ पाणिना ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
गाय़न्ति दिव्यतानैस्ते यथान्याय़ं मनस्विनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
गाय़न्त्यारण्यके विप्रा मद्भक्तास्तेऽपि दुर्लभाः ||
३२ ग
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
गाय़न्त्यो वै हसन्त्यश्च लोभय़न्त्यश्च तं द्विजम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
गाय़न्नृत्यन्वादय़ंश्च देवय़ानीमतोषय़त् ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
गाय़मानास्तथैवान्ये नृत्यमानास्तथापरे |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
१०
अर्जुन उवाच
गाय़ामि नृत्याम्यथ वादय़ामि; भद्रोऽस्मि नृत्ते कुशलोऽस्मि गीते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
गिरं तां मधुरां श्रुत्वा गौतमो विस्मितस्तदा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
गिरा त्वं हृदय़ं वाचं शमय़स्व मनांसि च ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
गिरा नाश्वासय़स्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम् ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिं कोलाहलं तं तु पदा वसुरताडय़त् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिं चचारारिहरः किंनराचरितं शुभम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
गिरिं जलागमे यद्वज्जलदा जलधारिणः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
गिरिं य इच्छेत तलेन भेत्तुं; शिलोच्चय़ं श्वेतमतिप्रमाणम् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
गिरिकन्दरजो भीमः सिंहो नागकुलान्तकः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिकाय़ाः प्रय़च्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिकूटनिकाशानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
गिरिकूटनिभाः केचित्केचिन्महिषसंनिभाः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिकूटेषु तुङ्गेषु नानाजनपदेषु च |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिकूवरं पादपाङ्गं शुभवेणु त्रिवेणुकम् |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
गिरिगह्वरपृष्ठेषु व्याजहार शुकं प्रति ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
गिरिगह्वरमासाद्य शार्दूलाविव रोषितौ |
१२ क