वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिदुर्गे समापन्नं काय़ेनावृत्य कन्दरम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिदुर्गेषु हि सदा देशेषु विषमेषु च |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
गिरिपृष्ठं समारुह्य सुतो व्यासस्य भारत |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
गिरिपृष्ठमुपारुह्य प्रासादं वा रहोगतः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
गिरिपृष्ठेषु रम्येषु व्याहरन्तो जनप्रिय़ाः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
गिरिप्रकाशान्क्षितिजान्भञ्जेय़मनिलो यथा ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
गिरिप्रपाते गहने चैत्यस्थाने चतुष्पथे |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
गिरिप्रस्थे तु सा यस्मिन्स्थिता स्वसितलोचना |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
गिरिप्रस्थेषु रम्येषु शुभेषु सुसुगन्धिषु ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
गिरिप्रस्रवणैर्यद्वद्गिरिर्धातुविमिश्रितैः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
गिरिमस्तं समासाद्य प्रत्यपद्यत भानुमान् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
गिरिमात्रा हि ते नागा भिन्नाञ्जनचय़ोपमाः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
गिरिमुञ्जं समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
१०२ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
गिरिराजमिमं तावत्पृच्छामि नृपतिं प्रति ||
३८ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
गिरिरात्मरुहैः फुल्लैः कर्णिकारैरिवावृतः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
गिरिरूपधराश्चापि पतिताः कुञ्जरोत्तमाः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
गिरिव्रजगताश्चापि नग्नजित्प्रमुखा नृपाः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
गिरिव्रजाद्वहिस्तस्थौ समे देशे महाय़शाः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
गिरिव्रजे निरुद्धानां राज्ञां कृष्णेन मोक्षणम् |
९९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
गिरिशं वरदं देवं भवं भावनमव्ययम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
गिरिशाय़ प्रशान्ताय़ पतय़े चीरवाससे ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
गिरिशाय़ प्रशान्ताय़ यतय़े चीरवाससे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
गिरिशृङ्गे तथा चैत्ये वृक्षाग्रेषु च योजजेत् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
गिरिशृङ्गोपमश्चात्र नाराचेन निपातितः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
गिरिसानुरुहा भग्ना द्विपेनेव महाद्रुमाः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
गिरिसानुरुहाः सौम्या देवानामुपपादय़ेत् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
गिरिस्रवाभिः पुण्याभिः सर्वतोऽनुगता शुभा ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
गिरीणां शिखराण्येव न्यपतन्त महीतले ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
गिरीणामपि भेत्तारं साय़कं समय़ोजय़त् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
गिरीशस्य यथान्याय़मुपहारमुपाहरत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
गिरेः शिखरजः श्रीमान्सुशाखः सुप्रतिष्ठितः |
६९ क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
गिरेः शिखरमुद्यानमिदं भरतसत्तम ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
गिरेः सारं यथा हेम पुष्पात्सारं यथा मधु |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
गिरेः सुजाताङ्कुरपुष्पितद्रुमं; महेन्द्रवज्रः शिखरं यथोत्तमम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
गिरेरधिष्ठानमस्य भवान्भवितुमर्हति ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
गिरेरिव लघुत्वं तच्छीतत्वमिव पावके |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
गिरेर्मुञ्जवतः पादं तपस्तप्तुं महातपाः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
गिरेर्विशीर्यमाणस्य तस्य रूपं तदा वभौ |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
गिरेर्हिमवतः पृष्ठे मुञ्जवान्नाम पर्वतः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
गिरेश्चोच्छ्रय़मागम्य तस्थौ तत्र स वानरः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
गिरेस्तु कूटजो भग्नो मारुतेनेव पादपः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भृगुकुलोद्वह ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
गिर्यग्राद्वा निपतनं तादृक्तव चिकीर्षितम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
गिर्यग्रे वानरान्पञ्च वीरौ ददृशतुस्तदा ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
गिर्याश्रय़ा दुर्गनिवासिनश्च; योधाः पृथिव्यां कुलजा विशुद्धाः |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण्यु उवाच
गिरय़ः पर्वताश्चैव किय़त्यध्वनि तद्वनम् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
गिरय़ः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
गीतं केकय़राजेन ह्रिय़माणेन रक्षसा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
गीतं दृष्टार्थतत्त्वेन वामदेवेन धीमता ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
अर्जुन उवाच
गीतं नृत्तं विचित्रं च वादित्रं विविधं तथा |
२४ क