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शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
गीतं राज्ञा सेनजिता दुःखार्तेन युधिष्ठिर ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
गीतं वा यदि वा नृत्तं वादित्रं वा पृथग्विधम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
गीतं विदेहराजेन जनकेन प्रशाम्यता ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६८
भीष्म उवाच
गीतं विदेहराजेन माण्डव्याय़ानुपृच्छते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
गीतं सनत्कुमारेण व्यासेन च महात्मना |
१२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
गीतगन्धर्वघोषैश्च भेरीपणवनिस्वनैः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्ययनध्वनिम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
गीतप्रिय़ा च कल्याणी कद्रुला चामिताशना ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
गीतमाधुर्यसम्पन्नौ विख्यातौ च हहाहुहू |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
गीतवादित्रकुशलाः शम्यातालविशारदाः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
गीतवादित्रवन्तश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
गीतवादित्रशव्देन व्यक्रीडन्त यशस्विनः ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
गीतवादित्रसंह्रादैस्ताललास्यसमन्वितम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
गीतसामस्वनस्तात श्रूय़ते गन्धमादने ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
गीताः क्षमावता कृष्णे काश्यपेन महात्मना ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
गीतानां तलतालानां यथा साम्नां च निस्वनः |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
गीतैश्च विविधैरिष्टै रमते यो दिवानिशम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
गीतैश्च स्तुतिसंय़ुक्तैः प्रीत्यर्थमुपजग्मिरे ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
गीतैस्तथा किंनराणामुदारैः; शुभैः स्वनैः सामगानां च वीर ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
गीर्भिर्दारुणय़ुक्ताभिरभिहन्युरपूजिताः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
गीर्भिर्मङ्गलय़ुक्ताभिरनुध्याय़न्ति पूजिताः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
गीर्भिर्मङ्गलय़ुक्ताभिर्व्राह्मणानां महात्मनाम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
गीय़तां वेदशव्दैश्च पूज्यतां च यथाविधि ||
९८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
गुग्गुलुः प्रवरस्तेषां सर्वेषामिति निश्चय़ः ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
गुडाकेशो महातेजा वालस्य धृतवर्मणः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
गुडाकेशो हृषीकेशमभ्यभाषत पाण्डवः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
गौतम्यु उवाच
गुणं चान्यं नास्य वधे प्रपश्ये; तस्मात्सर्पं लुव्धक मुञ्च जीवम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
गुणकेशीति विख्याता नाम्ना सा देवरूपिणी |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
गुणक्षय़त्वात्प्रकृतिः कर्तृत्वादक्षय़ं वुधाः |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
गुणज्येष्ठास्तथा ज्येष्ठा भूय़ांसो यद्वय़ं परैः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
गुणतत्त्वान्यथैतानि निर्गुणोऽन्यस्तथा भवेत् ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
गुणतश्चैव सिद्धानि प्रमाणगुणवन्ति च ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
गुणतोऽभ्यधिकं ज्ञात्वा वलतः शौर्यतोऽपि वा |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
जनमेजय़ उवाच
गुणप्रभाववीर्यौजःसत्त्वोत्साहवतामहम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
भीष्म उवाच
गुणप्रवर्हां शीलेन साध्वीं चारित्रशोभनाम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
गुणप्रसवसम्वाधमसम्वाधमनामय़म् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
गुणप्रसारिणी वुद्धिर्हुताशन इवेन्धने ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वासुदेव उवाच
गुणभूताः स्म ते राजंस्त्वं नो राजन्मतो गुरुः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
व्यास उवाच
गुणभूतानि भूतानि तत्र त्वमुपभोक्ष्यसे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
गुणभूतो जय़ः कृष्णे पृष्ठतोऽन्वेति माधवम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
गुणवचनसमुच्चय़ैकदेशो; नृवर मय़ैष गवां प्रकीर्तितस्ते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
गुणवत्तरमात्मानं स्वेन मानेन दर्पिताः ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
गुणवत्पावको मह्यं दीप्यते हव्यवाहनः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
भीष्म उवाच
गुणवत्यल्पदोषः स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
गुणवत्सु कथं द्वेषं धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
गुणवद्भिर्गुणोपेतं यदा ध्यानगुणं मनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
गुणवद्भोजय़ित्वा च ततः पश्चाद्विनिन्दति ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
गुणवद्वाक्यमादत्ते हंसः क्षीरमिवाम्भसः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
गुणवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुः पुरुषाधमम् ||
२९ ख