अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
गुणवन्तमपत्यं वै त्वं च सा जनय़िष्यथः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाध्यक्षं सदक्षिणम् ||
८८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
गुणवन्ति च पानानि भोज्यानि रसवन्ति च |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
गुणवन्तो महोत्साहा धर्मज्ञाः साधवश्च ये |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
गुणवन्त्यन्नपानानि भोज्यानि विविधानि च |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
गुणवाँल्लोकविख्यातः पौराणां च सुसंमतः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
गुणवांश्चाप्यगुणवान्यथातत्त्वं निवोध मे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
गुणवाञ्शीलवान्दान्तो मृदुर्धर्म्यो जितेन्द्रिय़ः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
गुणवान्विगुणानन्यान्नूनं पश्यसि सत्कृतान् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
गुणवृत्तं तथा कृत्स्नं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
गुणसङ्कीर्तनं चापि स्वय़मेव शतक्रतो ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
गुणसङ्गेष्वनासक्त एकचर्यारतः सदा |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
गुणस्त्वेवापरस्तत्र सङ्घात इति षोडशः |
१०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
गुणस्यास्य निवृत्तौ तु न भर्ता न पतिः पतिः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
गुणस्वभावस्त्वव्यक्तो गुणानेवाभिवर्तते |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
गुणहीनं परेषां च वहु पश्यामि भारत |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
गुणहीनो हि तं मार्गं वहिः समनुवर्तते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
गुणा गुणवतः सन्ति निर्गुणस्य कुतो गुणाः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
गुणा गुणेषु जाय़न्ते तत्रैव निविशन्ति च |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
गुणा गुणेषु लीय़न्ते तदैका प्रकृतिर्भवेत् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
गुणा गुणेषु सततं सागरस्योर्मय़ो यथा ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
गुणा दश स्नानशीलं भजन्ते; वलं रूपं स्वरवर्णप्रशुद्धिः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
गुणा न हि मय़ा शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि |
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
गुणांश्च तमसः सर्वान्गुणान्वुद्धेश्च भारत ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
गुणांश्च मनसस्तद्वन्नभसश्च गुणांस्तथा |
८८ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्राह्मण उवाच
गुणांस्तत्त्वेन मे व्रूहि यथावदिह पृच्छतः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
दमय़न्त्यु उवाच
गुणांस्तस्य स्मरन्त्या मे तत्पराय़ा दिवानिशम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
गुणांस्तु शृणु मे राजन्सान्त्वस्य भरतर्षभ |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
गुणांस्तेषां समादत्ते रागेण प्रतिमोहितः ||
११९ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
गुणाः क्रोधाभिभूतेन न शक्याः प्राप्तुमञ्जसा ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
गुणाः पञ्चाशतं प्रोक्ताः पञ्चभूतात्मभाविताः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
गुणाः पूर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
९
सहदेव उवाच
गुणाः सुविदिता ह्यासन्मम तस्य महात्मनः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
गुणाः स्वर्गस्य प्रोक्तास्ते दोषानपि निवोध मे ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
गुणागुणमनासङ्गमेककार्यमनन्तरम् |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
गुणागुणमनासङ्गमेकचर्यमनन्तरम् |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणिज्ञानमभिज्ञता |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
मनुरु उवाच
गुणात्मकं कर्म वदन्ति वेदा; स्तस्मान्मन्त्रा मन्त्रमूलं हि कर्म |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
गुणादाने विप्रय़ोगे च तेषां; मनः सदा वुद्धिपरावराभ्याम् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
युधिष्ठिर उवाच
गुणाधिकेभ्यो विप्रेभ्यो दद्याद्भरतसत्तम ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
गुणानां गुणभूतानां यत्परं परतो महत् ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
गुणानां ग्रहणं सम्यग्वक्ष्याम्यहमतः परम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
गुणानां प्रसवत्वाच्च तथा प्रसवधर्मवान् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
गुणानां महदादीनामुत्पद्यति परस्परम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
गुणानां रक्षणे नित्यं प्रय़तस्व सवान्धवः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
गुणानां साम्यमागम्य मनसैव मनोवहम् |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
गुणानां हि प्रधानानामेकत्वं त्वय़ि तिष्ठति ||
५६ ख