शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
गुणानामपि यद्यत्तत्कर्म जानात्युपस्थितम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
गुणानामेव वक्तारः सन्तः सत्सु युधिष्ठिर ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
गुणानेतान्प्रसङ्ख्याय़ देशकालौ प्रय़ोजय़ेत् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
गुणान्कथय़तां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
गुणान्गुणवतः शल्य गुणवान्वेत्ति नागुणः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
गुणान्गुणशतैर्ज्ञात्वा दोषान्दोषशतैरपि |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
गुणान्धारय़ते ह्येषा सृजत्याक्षिपते तथा ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
गुणान्निःसंशय़ाद्राजन्नैर्गुण्यं मन्यसे कथम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
गुणान्नेनीय़ते वुद्धिर्वुद्धिरेवेन्द्रिय़ाण्यपि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
गुणान्नेनीय़ते वुद्धिर्वुद्धिरेवेन्द्रिय़ाण्यपि |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
गुणान्पार्थस्य संस्मृत्य दुःखार्ताः परमातुराः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
गुणान्यदिह पश्यन्ति तदिच्छन्त्यपरे जनाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
गुणान्वाय़ोश्च धर्मात्मंस्तेजसश्च गुणान्पुनः ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
गुणान्विक्रिय़तः सर्वानुदासीनवदीश्वरः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
गुणान्सन्त्यज्य शव्दादीन्पदमध्यगमत्परम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
गुणाभावात्प्रकृत्या च निस्तर्क्यं ज्ञेय़संमितम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव वा |
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
मन उवाच
गुणार्थान्नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तवः ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
गुणार्थिनां गुणः कार्यो विदुषां ते जनाधिप |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
गुणाश्च यस्मिन्वहवो दोषहानिश्च केवला ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते; आरोग्यमाय़ुश्च सुखं वलं च |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
गुणाश्चात्र सुदुर्ज्ञेय़ा ज्ञाताश्चापि सुदुष्कराः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
गुणाश्चैषां यथातत्त्वं प्रेत्य चेह च सर्वशः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
गुणास्ते कीर्तिताः सर्वे किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
गुणास्ते देवताभूताः सततं भुञ्जते हविः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
गुणास्ते न विराजन्ते तेनासि हरिणः कृशः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
गुणास्त्रय़स्तेजसि च त्रय़श्चाकाशवातय़ोः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
गुणेभ्यः पञ्चभूतानि एष भूतसमुच्छ्रय़ः ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
गुणेषु दृष्टानचिरादिहात्मवा; न्सतोऽभिसन्धाय़ निहन्ति शात्रवान् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
गुणेषु परिमेय़ेषु निग्रहानुग्रहौ प्रति ||
१३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
गुणैः समुदितं सम्यगिदं नः प्रथितं कुलम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
गुणैः समुदितः सर्वैर्वय़सा च समन्वितः |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
गुणैः समुदितान्दृष्ट्वा पौराः पाण्डुसुतांस्तदा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
युधिष्ठिर उवाच
गुणैः सर्वैरुपेतश्च को न्वस्ति भुवि मानवः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
गुणैकदेशवचनं शक्यं पाराय़णं न तु ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४३
अतिथिरु उवाच
गुणैरनवमैर्युक्तः समस्तैराभिकामिकैः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
गुणैरनेकैः प्रवरैश्च युक्तो; विज्ञानवान्नैव च निष्ठुरो यः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
गुणैरपि परिक्षीणं शरीरं मर्त्यतां गतम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७८
अश्वपतिरु उवाच
गुणैरुपेतं सर्वैस्तं भगवन्प्रव्रवीषि मे |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
गुणैरेते हि वास्यन्ते कामगाः पक्षिणो यथा ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
शकुन्तलो उवाच
गुणैर्दिव्यैरप्सरसां मेनके त्वं विशिष्यसे |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
गुणैर्भविष्यति विभो सदृशो वंशय़ोर्द्वय़ोः |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते विय़ुज्यन्ते तथैव च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
गुणैर्भूतानि युज्यन्ते विय़ुज्यन्ते तथैव च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
गुणैर्यस्त्ववरैर्युक्तः कथं विद्याद्गुणानिमान् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
गुणैर्विशिष्टांश्च पुरोदधाति; विपश्चितस्तस्य नय़ाः सुनीताः ||
९८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
गुणैर्वृद्धानतिक्रम्य हरिरर्च्यतमो मतः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
गुणैर्हि गुणवानेव निर्गुणश्चागुणस्तथा |
२ क