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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाव्रवीत् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
गुरुणा त्वभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
गुरुणा धर्मशीलेन जय़माशास्स्व मे विभो ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुणा धर्मशीलेन व्यासेनाद्भुतकर्मणा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
गुरुणा मे यथाख्यातमर्थतस्तच्च मे शृणु ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुणा विविधैर्वाक्यैः क्रोधः प्रशममागतः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
गुरुणा वैरनिर्वन्धो न कर्तव्यः कदाचन |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
गुरुणा समनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सय़न् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
गुरुतल्पं हि गुर्वर्थे न दूषय़ति मानवम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
गुरुतल्पमधिष्ठाय़ दुरात्मा पापचेतनः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
गुरुतल्पी गुरुद्वेषी गुरुकुत्सारतिश्च यः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
गुरुतल्पी शिलां तप्तामाय़सीमधिसंविशेत् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
गुरुत्वं त्वय़ि सम्प्रेक्ष्य जामदग्न्य पुरातनम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुत्वं भवति प्रेक्ष्य वहून्क्लेशांस्तितिक्ष्महे ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
गुरुत्वं सन्नभावत्वमसितत्वमवाग्गतिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
गुरुत्वेनाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः |
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
गुरुदारगामिनां ये च पिशुनानां च ये तथा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
गुरुदारप्रसक्तानां गतिं विज्ञाय़ चाशुभाम् ||
४२ ग
आदि पर्व
अध्याय ७९
यय़ातिरु उवाच
गुरुदारप्रसक्तेषु तिर्यग्योनिगतेषु च |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
गुरुदैवतपूजा च नातिवर्तन्ति भूमिदम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
गुरुदैवतपूजार्थं स्वाध्याय़ाभ्यसनात्मकः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
गुरुद्विजसहः क्षान्तस्तस्य गोभिः समा गतिः ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुधर्माभिगुप्ता च श्रेय़ः क्षिप्रमवाप्स्यसि ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
गुरुनिन्दा दहत्याय़ुर्मनुष्याणां न संशय़ः ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
अहल्यो उवाच
गुरुपत्नीप्रिय़ार्थं वै ते समानय़ितुं तदा ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
गुरुपत्नीमुपासीनो विपुलः स महातपाः |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
गुरुपत्न्याः शरीरस्थो ददर्श च सुराधिपम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
गुरुपुत्रं समासाद्य भीष्मस्य पुरतः स्थितम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७२
देवय़ान्यु उवाच
गुरुपुत्रस्य पुत्रो वै न तु त्वमसि मे पितुः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ७२
कच उवाच
गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याचक्षे न दोषतः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
मरुत्त उवाच
गुरुपुत्रो ममेति त्वं ततो मे प्रीतिरुत्तमा ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
गुरुपुत्रोऽद्य सर्वेषामस्माकं परमा गतिः |
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रिय़संय़मः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
गुरुपूजा च कौरव्य दय़ा भूतेष्वपैशुनम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
भीष्म उवाच
गुरुपूजा च सततं वृद्धानां पर्युपासनम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
भीष्म उवाच
गुरुपूजानसूय़ा च दय़ा भूतेष्वपैशुनम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वय़मर्थान्ववेक्षिता |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
गुरुप्रवोधशङ्की च तमुपैक्षत सूतजः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८४
भृगुरु उवाच
गुरुप्रसादलव्धस्वाध्याय़तत्परः स्यात् ||
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
गुरुप्रसादे स्वाध्याय़े यतन्ते ये स्थिरव्रताः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
गुरुभक्तः स तेजस्वी नान्यं कञ्चिदपूजय़त् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
गुरुभारः कपोतश्च सूर्यनेत्रश्चिरान्तकः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
गुरुभारसहस्कन्धे नागस्यासिमपातय़त् ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३८
वृहन्नडो उवाच
गुरुभारसहो दिव्यः शात्रवाणां भय़ङ्करः ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
गुरुभिः समनुज्ञातः काश्यपेन च धीमता ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
गुरुभिर्निय़मैर्युक्तो भरतो नाम पावकः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
गुरुभ्य आसनं देय़ं कर्तव्यं चाभिवादनम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
गुरुभ्य आसनं देय़मभिवाद्याभिपूज्य च |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
गुरुमाक्रोशतः क्षुद्र न चाधर्मेण पात्यसे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
गुरुरग्र्यः परो धर्मः पोषणाध्ययनाद्धितः |
१६ क