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अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
तं च हन्यति यस्यान्नं स हत्वा हन्यतेऽवुधः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
तं चक्ररक्षौ पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तं चतुर्दशभिः पार्थश्चित्रपुङ्खैः शिलाशितैः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तं चतुर्दशभिः पार्थो नाराचैः कङ्कपत्रिभिः |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
तं चतुर्दशभिर्वाणैर्वाणं चिच्छेद सात्यकिः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
तं चरन्तं महारङ्गे निस्त्रिंशवरधारिणम् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
तं चरन्तं रणे पार्था ददृशुः कौरवं युधि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
तं चराविमनाः पार्थ दुश्चरं दुर्वलेन्द्रिय़ैः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तं चात्मानं वहुधा दर्शय़ानं; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
तं चादाय़ जनं पौरं रजसे सम्प्रय़च्छति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
तं चादिदेवं सततं प्रपन्न; एकान्तभावेन वृणोम्यजस्रम् |
४ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तं चापि पतितं दृष्ट्वा भीमो राजानमव्रवीत् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तं चापि पार्थो नवभिः पृषत्कै; र्विव्याध राजंस्तुमुले महात्मा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
तं चापि प्रथितं लोके कथं राजा निवर्तय़ेत् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तं चापि राजानमथोत्पतन्तं; क्रुद्धं यथैवान्तकमापतन्तम् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
तं चापि वशमानीय़ किरीटी पुरुषर्षभः |
७ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तं चापि विनिहत्योग्रं भीमः प्रहरतां वरः |
१०१ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तं चापि सर्वे प्रतिपूजय़न्तो; हृष्टा व्रुवाणाः सहदेवमाजौ |
६३ क
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
तं चापि हिंसितं तात मुनिं मूलफलाशिनम् |
७ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तं चाप्यतिक्रमन्तस्ते ददृशुर्वालुकार्णवम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
तं चाप्यतिरथः श्रीमानाश्रमं प्रत्यपद्यत |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तं चाप्याथ ततो रक्षः प्रतिजग्राह वीर्यवान् |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तं चाभिमन्युर्वचनात्पितुर्ज्येष्ठस्य भारत |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
तं चारुवेषाः सुश्रोण्यः सहस्रं वरय़ोषितः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
तं चारुवेषाः सुश्रोण्यस्तरुण्यः प्रिय़दर्शनाः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
तं चास्मै हय़माचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
तं चास्य मनसा द्रोणः पूजय़ामास विक्रमम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तं चाह भगवांस्तुष्टो ग्रन्थकारो भविष्यसि |
६९ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
तं चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तं चाहमपि शोचन्तं दृष्ट्वैकाकिनमाहवे |
४२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
तं चाय़ं लभतां काममद्यैव मुनिसत्तम ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
तं चितागतमाज्ञाय़ वैश्वानरमुखे हुतम् |
२८ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तं चिताग्निगतं वीरं शूरपुत्रं वराङ्गनाः |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
तं चित्रमाल्याभरणं युवत्यः शोककर्शिताः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
तं चित्रमाल्याभरणाः कृतविद्या मनस्विनः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तं चित्रसेनो विशिखैर्विपाठैः; सङ्ग्रामजिच्छत्रुसहो जय़श्च |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तं चित्रो नवभिर्भल्लैर्वाह्वोरुरसि चार्दय़त् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
तं चिन्तय़ानमासीनं धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् |
२ क
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
तं चेज्जीवन्तमादित्यः प्रातरभ्युदय़िष्यति |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
तं चेत्तदा ते सकुमारवृद्धा; अवारय़िष्यन्कुरवः समेताः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
युधिष्ठिर उवाच
तं चेत्पितामहं वृद्धं हन्तुमिच्छामि माधव |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
तं चेत्पुत्रात्प्रिय़तरं प्रतिय़ोत्स्ये धनञ्जय़म् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
तं चेत्सततमृत्विजं न मृत्युर्नामृतं भवेत् |
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तं चेद्धन्तासि राधेय़ त्वं नो राजा भविष्यसि ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
तं चेद्वित्तमुपागच्छेद्वर्तमानं स्वकर्मणि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तं चेन्न यजसे राजन्प्राप्तस्त्वं देवकिल्विषम् ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षते; सदाप्रमत्तः समरे पाण्डुपुत्रम् |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षे; त्सदाप्रमत्तः समरे किरीटिनम् |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तं चैव क्रूरकर्माणं घृताक्तं कुशचीरिणम् |
१४ क